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दिव्य फल से हनुमान जन्म

दिव्य फल से हनुमान जन्म अंजना माँ को पुत्र प्राप्ति की इच्छा थी। उसी काल में अयोध्या के राजा दशरथ भी पुत्रों की प्राप्ति के लिए यज्ञ करवा रहे थे। जिनमें से उत्पन्न हुए फल को तीन रानीयों नें खाया लेकिन यग्योत्पति से निकला एक फल पक्षी ले उड़ा, उसनें वह फल एक पर्वत पर गिरा दिया, जहाँ अंजना माँ भ्रमण कर रही थीं, महादेव की प्रेरणा से उन्होंने उस फल को खाया, जिससे हनुमान जी का जन्म हुआ। इसी कारण बजरंगबली भरत सम भाई कहे जाते हैं।

Diwali kyo manaye jati hai

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https://youtu.be/XWqaohv0twM?si=Jugbup3P_yLq9d9b

आज का ज्ञान

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तेजा दशमी

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तेजा दशमी के पीछे की कहानी किंवदंतियों और मान्यताओं के साथ इतिहास पर नजर डालें तो वीर तेजाजी का जन्म विक्रम संवत 1130 माघ शुक्ल चतुर्दशी (गुरुवार 29 जनवरी 1074) को खरनाल में हुआ था. वह नागौर जिले के खरनाल के मुखिया कुंवर तहरजी के पुत्र थे. माता का नाम राम कंवर था. किंवदंतियों में अब तक दर्ज जानकारी के अनुसार तेजाजी का जन्म माघ सुदी चतुर्दशी को 1130 ई. में हुआ था, जबकि ऐसा नहीं है. तेजाजी का जन्म विक्रम संवत 1243 के माघ सुदी चौदस को हुआ था. तेजाजी जन्म कथा वहीं, तेजाजी की वीर गति का वर्ष 1160 दंतकथाओं में दर्ज है. जबकि सच्चाई इसके उलट है. तेजाजी को वीर गति 1292 में अजमेर में पनेर के पास सुरसुरा में मिली थी. हालांकि तिथि भादवा की दसवीं ही है. कहा जाता है कि वीर तेजाजी का जन्म भगवान शिव की पूजा और नाग देवता की कृपा से ही हुआ था. जाट परिवार में जन्में तेजाजी को जाति व्यवस्था का विरोधी भी कहा जाता है. तेजाजी का विवाह बचपन में हुआ था कहा जाता है कि वीर तेजाजी का विवाह बचपन में ही हो गया था. उनका विवाह पनेर गांव के रायमलजी की पुत्री पेमल से हुआ था. पेमल के मामा इस रिश्ते के खिलाफ ...

गणेश चतुर्थी व्रत कथा

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गणेश चतुर्थी व्रत कथा पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के विवाह के समय की बात है. विवाह की तैयारियां की जा रही थीं. सभी देवी-देवताओं, गंधर्वों और ऋषियों-मुनियों को विवाह के लिए निमंत्रण दिया जा रहा था. लेकिन गणेश जी को इस विवाह के लिए आमंत्रित नहीं किया गया. विष्णु जी की बारात के समय सभी देवी-देवताओं ने देखा कि भगवान गणपति बारात में कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं. सबने जानना चाहा कि गणपति को विवाह का बुलावा नहीं दिया गया है या वो अपनी मर्जी से विवाह में नहीं आए हैं. देवताओं ने भगवान विष्णु से गणेश जी की अनुपस्थिति का कारण पूछा. भगवान विष्णु ने उत्तर दिया भगवान शिव को न्यौता दिया गया है. गणेश उनके साथ आना चाहें तो आ सकते हैं. साथ ही यह भी कहा कि गणेश बहुत अधिक भोजन करते हैं. ऐसे में किसी और के घर ले जाकर हम उनको पेट भर भोजन कैसे करवाएंगे. उनकी यह बात सुनकर एक देवता ने यह सुझाव दिया कि गणपति को बुला लेते हैं, लेकिन उनको विष्णुलोक की रक्षा में यही छोड़ कर चले जाएंगे. इससे न बुलाने की चिंता भी खत्म हो जाएगी और उनके खाने की चिंता भी खत्म हो जाएगी. सबको यह उपाय पसं...

कर्मों का डर कहीं ना कहीं

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जहर क्या है

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जय श्री कृष्णा

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5 वामन अवतार / Vamana Avatar

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  वामन अवतार / Vamana Avatar एक समय देवताओं और दैत्यों में युद्ध हुआ। देवता पराजित हुए और दैत्यों ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। तब देवताओं की रक्षा और दैत्यों के विनाश के लिए महर्षि कश्यप और देवमाता अदिति ने भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने कश्यप और अदिति के पुत्र रूप में जन्म लेने का वचन दिया। साथ ही देवताओं पर आयी हुई विपत्ति का नाश करने का भी वरदान दिया। समय आने पर अदिति के गर्भ से भगवान विष्णु ने वामन अवतार ग्रहण किया। भगवान को पुत्र रूप में प्राप्त करके माता अदिति को अपार हर्ष हुआ तब कश्यप जी ने उनका जातकर्म संस्कार किया। इसके बाद ब्रह्मर्षियों ने भगवान वामन का उपनयन संस्कार किया। उस समय वामन बटुक को महर्षि पुलह ने यज्ञोपवीत, पुलस्त्य ने दो श्वेत वस्त्र, अगस्त्य ने मृगचर्म, भरद्वाज ने मेखला, मरीचि ने पलाशदंड, वशिष्ठ ने अक्षसूत्र, अंगिरा ने कुश का बना हुआ वस्त्र, सूर्य ने क्षत्र, भृगु ने खड़ाऊं और देवगुरु बृहस्पति ने कमण्डलु प्रदान किया। उपनयन के बाद भगवान वामन ने अङ्गोंसहित वेदों और शास्त्रों का अध्ययन करके एक ही मास में उनमें निपुणता ...

4 नृसिंह अवतार / Narsingh Avatar

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 नृसिंह अवतार / Narsingh Avatar अपने प्रिय भाई हिरण्याक्ष के वध से संतप्त होकर हिरण्यकश्यप दैत्यों और दानवों को अत्याचार करने की आज्ञा देकर स्वयं महेन्द्राचल पर्वत पर चला गया। उसके ह्रदय में वैर की आग धधक रही थी अतः वह भगवान विष्णु से बदला लेने के लिए ब्रह्मा जी की घोर तपस्या करने लगा। इधर हिरण्यकश्यप को तपस्या में रत देखकर देवराज इन्द्र ने दैत्यों पर चढ़ाई कर दी। दैत्यगण राजाविहीन होने के कारण युद्ध में पराजित हुए और भाग कर पाताललोक में शरण ली। इन्द्र ने राजमहल में प्रवेश करके हिरण्यकश्यप की पत्नी कयाधू को बंदी बना लिया। उस समय वह गर्भवती थी, इसलिए इन्द्र उसे साथ लेकर अमरावती की ओर जाने लगे। रास्ते में उनकी देवर्षि नारद से भेंट हो गयी। नारद जी ने कहा – ” देवराज, इसे कहाँ ले जा रहे हो ? ” इन्द्र ने कहा – ” देवर्षे ! इसके गर्भ में हिरण्यकश्यप का अंश है, उसे मार कर इसे छोड़ दूंगा। “ यह सुनकर नारद जी ने कहा – ” देवराज ! इसके गर्भ में बहुत बड़ा भगवद्भक्त है, जिसे मारना तुम्हारी शक्ति के बाहर है, अतः इसे छोड़ दो। “ नारद जी के कथन का मान रखते हुए इन्द्र ने कयाधू को छोड़ दिया और अमरावती च...

3. वराह अवतार / Varaha Avatar

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 वराह अवतार / Varaha Avatar एक समय की बात है। ब्रह्मा जी के मानसपुत्र सनकादि ऋषिगण भगवद्दर्शन की लालसा लिए बैकुण्ठ धाम में जा पहुँचे। वहां द्वार पर उन्हें हाथ में गदा लिए दो समान आयु के देवश्रेष्ठ दिखाई दिए। वे दोनों भगवान के पार्षद जय और विजय थे। जय-विजय सनकादि का मार्ग रोककर खड़े हो गए। यह देखकर सनकादि क्रुद्ध हो गए और उन दोनों द्वारपालों को श्राप देते हुए कहा – ” तुम भगवान बैकुण्ठ नाथ के पार्षद हो, किन्तु तुम्हारी बुद्धि अत्यंत मंद है। तुम अपनी भेदबुद्धि के दोष से इस बैकुण्ठ लोक से निकलकर उन पाप योनियों में जाओ जहाँ काम, क्रोध और लोभ रहते हैं। “ सनकादि के श्राप से व्याकुल होकर जय-विजय उनके चरणों में लोटकर क्षमा प्रार्थना करने लगे। इधर जैसे ही श्री भगवान पद्मनाभ को विदित हुआ कि उनके पार्षदों ने सनकादि का अनादर किया है, वे तुरंत लक्ष्मी सहित वहाँ पहुँच गए। भगवान को स्वयं वहाँ देखकर सनकादि की विचित्र दशा हो गयी। वे तुरंत भगवान को प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे। तब भगवान सनकादि की प्रशंसा करते हुए बोले – ” ये जय-विजय मेरे पार्षद हैं। इन्होने आपका अपराध किया है। आपने इन्हें दंड देक...

2 कूर्म अवतार / Kurma Avatar

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  कूर्म अवतार / Kurma Avatar समुद्र मंथन के समय जब मंदराचल पर्वत को मथनी बनाया गया तो अपने विशाल आकार के कारण वो समुद्र में डूबने लगा। यह देखकर परम शक्तिमान श्रीभगवान एक विशाल एवं विचित्र कच्छप का रूप धारणकर मंदराचल पर्वत के नीचे पहुँच गए। कच्छपावतार भगवान की विशाल पीठ पर आश्रय पाकर मंदराचल पर्वत ऊपर उठ गया। इतना ही नहीं, वे मंदराचल पर्वत को ऊपर से दूसरे पर्वत की भाँति अपने हाथों से दबाकर स्थित हो गए। इस प्रकार समुद्र मंथन का कार्य सुचारु रूप से संपन्न हुआ। इसे ही भगवान विष्णु का कूर्म अवतार कहते हैं।

1 मत्स्य अवतार

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  मत्स्य अवतार  / Matsya Avatar सतयुग के आरम्भ में सत्यव्रत नाम से एक विख्यात राजर्षि हुए। राजा सत्यव्रत बड़े क्षमाशील, समस्त श्रेष्ठ गुणों से संपन्न और सुख-दुःख को समान समझने वाले एक वीर पुरुष थे। वे पुत्र को राज्यभार सौंप कर स्वयं तपस्या करने वन में चले गए। एक दिन राजर्षि सत्यव्रत नदी में स्नान करके तर्पण कर रहे थे। इतने में ही जल के साथ एक छोटी सी मछली उनके अंजलि में आ गयी। राजा ने जल के साथ ही उसे फिर से नदी में डाल दिया। तब उस मछली ने बड़ी करुणा के साथ राजा से कहा – ” राजन ! मेरी रक्षा कीजिये। आप जानते ही हैं कि जल में रहने वाले बड़े जीव अपने से छोटे जीवों को खा जाते हैं फिर आप मुझे इस जल में क्यों छोड़ रहे हैं ? “ राजा सत्यव्रत ने उस मछली की अत्यंत दीनतापूर्ण वाणी सुनकर उसे अपने कमंडल में रख लिया और आश्रम ले आये। एक ही रात में वह मछली इतनी बढ़ गयी कि कमंडल में उसके रहने के लिए स्थान ही नहीं बचा। तब वह राजा से बोली – ” राजन ! अब तो कमंडल में मेरा निर्वाह नहीं हो सकता, अतः मेरे लिए कोई बड़ा सा स्थान ठीक कीजिये। “ तब राजर्षि सत्यव्रत ने उस मछली को कमंडल से निकाल कर एक ...

समुद्र मंथन की कथा

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समुद्र मंथन की कथा   समुद्र मंथन एक अत्यंत महत्वपूर्ण पौराणिक घटना है जिसमें अमृत की प्राप्ति के लिए देवताओं और दैत्यों ने मिलकर समुद्र का मंथन किया था। आइये विस्तार से जानते हैं समुद्र मंथन की कथा , उसका कारण और परिणाम। ये कहानी शुरू होती है महर्षि दुर्वासा के शाप से जो उन्होंने देवराज इन्द्र को दिया था। महर्षि दुर्वासा भगवान शिव के ही अंशावतार थे और अपने क्रोध के लिए प्रसिद्ध थे पर ये बात और थी कि उनके क्रोध में भी कल्याण छिपा रहता था। समुद्र मंथन का कारण एक बार दुर्वासा मुनि पृथ्वी पर विचरण कर रहे थे। घूमते घूमते उन्होंने एक विद्याधरी के हाथों में सन्तानक पुष्पों की एक दिव्य माला देखी। उस दिव्य माला की सुगंध से वह वन सुवासित हो रहा था। तब उन्मत्त वृत्ति वाले दुर्वासा जी ने वह सुन्दर माला देखकर उसे उस विद्याधर सुंदरी से माँगा। उनके माँगने पर उस विद्याधरी ने उन्हें आदरपूर्वक प्रणाम करके वह माला दे दी। दुर्वासा मुनि ने उस माला को अपने मस्तक पर डाल लिया और पृथ्वी पर विचरने लगे। इसी समय उन्होंने ऐरावत पर विराजमान देवराज इन्द्र को देवताओं के साथ आते देखा। उन्हें देखकर दुर्वासा मु...

निर्जला एकादशी व्रत कथा!

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निर्जला एकादशी का महत्त्व: एकादशी व्रत हिन्दुओ में सबसे अधिक प्रचलित व्रत माना जाता है।  वर्ष में चौबीस एकादशियाँ  आती हैं, किन्तु इन सब एकादशियों में ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी सबसे बढ़कर फल देने वाली समझी जाती है क्योंकि इस एक एकादशी का व्रत रखने से वर्ष भर की एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है।निर्जला एकादशी का व्रत अत्यन्त संयम साध्य है। इस युग में यह व्रत सम्पूर्ण सुख़ भोग और अन्त में मोक्ष कहा गया है। कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों पक्षों की एकादशी में अन्न खाना वर्जित है। निर्जला एकादशी व्रत कथा! निर्जला एकादशी व्रत का पौराणिक महत्त्व और व्याख्यान भी कम रोचक नहीं है। जब सर्वज्ञ वेदव्यास ने पांडवों को चारों पुरुषार्थ: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाले एकादशी व्रत का संकल्प कराया था, तब युधिष्ठिर ने कहा: जनार्दन!  ज्येष्ठ  मास के  शुक्लपक्ष  में जो  एकादशी  पड़ती हो, कृपया उसका वर्णन कीजिये। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा: हे राजन्! इसका वर्णन परम धर्मात्मा सत्यवती नन्दन व्यासजी करेंगे, क्योंकि ये सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वज्ञ और वेद व...

sugar jad se khatam

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बृहस्पतिदेव की कथा (Shri Brihaspatidev Ji Vrat Katha)

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बृहस्पतिदेव की कथा (Shri Brihaspatidev Ji Vrat Katha) भारतवर्ष में एक प्रतापी और दानी राजा राज्य करता था। वह नित्य गरीबों और ब्राह्मणों की सहायता करता था। यह बात उसकी रानी को अच्छी नहीं लगती थी, वह न ही गरीबों को दान देती, न ही भगवान का पूजन करती थी और राजा को भी दान देने से मना किया करती थी। एक दिन राजा शिकार खेलने वन को गए हुए थे, तो रानी महल में अकेली थी। उसी समय बृहस्पतिदेव साधु वेष में राजा के महल में भिक्षा के लिए गए और भिक्षा माँगी रानी ने भिक्षा देने से इन्कार किया और कहा: हे साधु महाराज मैं तो दान पुण्य से तंग आ गई हूँ। मेरा पति सारा धन लुटाते रहिते हैं। मेरी इच्छा है कि हमारा धन नष्ट हो जाए फिर न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। साधु ने कहा: देवी तुम तो बड़ी विचित्र हो। धन, सन्तान तो सभी चाहते हैं। पुत्र और लक्ष्मी तो पापी के घर भी होने चाहिए। यदि तुम्हारे पास अधिक धन है तो भूखों को भोजन दो, प्यासों के लिए प्याऊ बनवाओ, मुसाफिरों के लिए धर्मशालाएं खुलवाओ। जो निर्धन अपनी कुंवारी कन्याओं का विवाह नहीं कर सकते उनका विवाह करा दो। ऐसे और कई काम हैं जिनके करने से तुम्हारा यश लोक-परलोक मे...

प्रेम मंदिर

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                                        प्रेम मंदिर प्रेम मंदिर भारत में उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा जिले के समीप वृंदावन में स्थित है।  इसका निर्माण जगद्गुरु कृपालु महाराज द्वारा भगवान कृष्ण और राधा के मन्दिर के रूप में करवाया गया है । मन्दिर का लोकार्पण १७ फरवरी को किया गया था। इस मन्दिर के निर्माण में ११ वर्ष का समय और लगभग १०० करोड़ रुपए की धन राशि लगी है। Video- 

विष्णु पुराण सम्पूर्ण कथा – (Vishnu Puran Katha in Hindi) सभी अध्याय एक ही जगह

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  विष्णु पुराण सम्पूर्ण कथा – (Vishnu Puran Katha in Hindi) सभी अध्याय एक ही जगह  विष्णु पुराण (Vishnu Puran)   -- 18 puran में विष्णु पुराण (Vishnu Puran Hindi) का आकार सबसे छोटा है, विष्णु पुराण (Vishnu Puran Ki Katha) में भगवान विष्णु के चरित्र का विस्तृत वर्णन है। विष्णु पुराण (Vishnu Puran Katha) के रचियता ब्यास जी के पिता पराशर जी हैं। विष्णु पुराण (Vishnu Puran in Hindi) में वर्णन आता है कि जब पाराशर के पिता शक्ति को राक्षसों ने मार डाला तब क्रोध में आकर पाराशर मुनि ने राक्षसों के विनाश के लिये ‘‘रक्षोघ्न यज्ञ’’ प्रारम्भ किया। उसमें हजारों राक्षस गिर-गिर कर स्वाहा होने लगे। इस पर राक्षसों के पिता पुलस्त्य ऋषि और पाराशर के पितामह वशिष्ठ जी ने पाराशर को समझाया और वह यज्ञ बन्द किया। इससे पुलस्त्य ऋषि बड़े प्रसन्न हुये औरा पाराशर जी को विष्णु पुराण के रचियता होने का आर्शीवाद दिया। विष्णु पुराण (Vishnu Puran)   -- 18 puran में विष्णु पुराण (Vishnu Puran Hindi) का आकार सबसे छोटा है, विष्णु पुराण (Vishnu Puran Ki Katha) में भगवान विष्णु के चरित्र का विस्तृत...

हृदय में सीताराम (रामायण की कहानी) | Hriday me Sita Ram Ramayan Ki Kahani

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 हृदय में सीताराम (रामायण की कहानी) | Hriday me Sita Ram Ramayan Ki Kahani यह प्रसंग उस समय का है, जब श्री राम भगवान लंका पर विजय प्राप्त कर के और 14 वर्ष का वनवास पूरा करके अयोध्या लौटे थे। उस समय पूरी अयोध्या बहुत ही खुश थी और हर्षोल्लास से भरी हुई थी। इसके तत्पश्चात श्री राम भगवान को राज सिंहासन मिलने जा रहा था, उनका राज तिलक समारोह चल रहा था, जिसके बीच में श्री राम भगवान ने अपनी मोतियों की माला हनुमान जी को दे दी। जैसे ही हनुमान जी ने वह माला प्राप्त की, उन्होंने वह तोड़ दी और उसके एक एक मोती को बड़े ध्यान से देखने लगे, सब इस बात को देखकर हैरान रह गए और सीता माता ने पूछा हनुमान इस माला को तोड़ने का क्या तात्पर्य है, यह तो तुम्हारे प्रभु श्री राम भगवान ने दी है। इस पर हनुमान जी ने जवाब दिया कि हे माता जिस चीज में श्री राम का नाम नहीं वह मेरे लिए बेकार है, इसीलिए यह मोतियों की माला मेरे किसी काम की नहीं। इसके पश्चात सीता जी ने श्री राम भगवान से यह प्रश्न किया कि हनुमान के हृदय में कौन विराज मान है, तत्पश्चात हनुमान जी ने अपना हृदय चीर कर दिखाया, वहां पर राम सीता की जोड़ी विराजमान...