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श्री कृष्ण भक्त संत श्री सूरदास जी की जीवनी

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श्री कृष्ण भक्त संत श्री सूरदास जी की जीवनी  श्री सूरदास जी का परिचय   श्री सूरदास जी पूर्ण भगवत्भक्त, अलौकिक कवी, महात्यागी, अनुपम वैरागी और परम प्रेमी भक्त थे, महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य के शब्दों में वे 'भक्ति के सागर' थे और श्री गोसाईं श्री विट्ठलनाथ जी के शब्दों में वे 'पुष्टिमार्ग के जहाज' थे। उनके द्वारा रचा गया सूरसागर ग्रन्थ काव्यामृत का असीम सागर है, जिसमें उन्होंने सवा लाख से अधिक पदों की रचना की थी। भगवान की लीलाओं का गायन ही उनकी अपार, अचल और अक्षुण संपत्ति थी।  श्री सूरदास जी का जन्म दिल्ली से कुछ दुरी पर सीही गांव में एक निर्धन ब्राह्मण के घर विक्रम संवत 1535 में वैशाख शुक्ल पंचमी के दिन हुआ था। बालक के जन्म के अवसर पर ऐसा  प्रतीत हुआ मानो धरती पर एक दिव्य ज्योति बालक सूरदास के रूप में उतरी, जिससे चारों और शुभ प्रकाश फ़ैल गया। ऐसा लगता था जैसे भगवती गंगा ने कलिकाल के प्रभाव को कम करने के लिए कायाकल्प किया है, शिशु के माता-पिता और समस्त गांव वाले आश्चर्यचकित रह गए।  जन्म के समय से ही श्री सूरदास जी के नेत्र बंद थे, वे देख नहीं सकते थे, जिसके कारण उनक...