3. वराह अवतार / Varaha Avatar

 वराह अवतार / Varaha Avatar

एक समय की बात है। ब्रह्मा जी के मानसपुत्र सनकादि ऋषिगण भगवद्दर्शन की लालसा लिए बैकुण्ठ धाम में जा पहुँचे। वहां द्वार पर उन्हें हाथ में गदा लिए दो समान आयु के देवश्रेष्ठ दिखाई दिए।


वे दोनों भगवान के पार्षद जय और विजय थे। जय-विजय सनकादि का मार्ग रोककर खड़े हो गए। यह देखकर सनकादि क्रुद्ध हो गए और उन दोनों द्वारपालों को श्राप देते हुए कहा –

” तुम भगवान बैकुण्ठ नाथ के पार्षद हो, किन्तु तुम्हारी बुद्धि अत्यंत मंद है। तुम अपनी भेदबुद्धि के दोष से इस बैकुण्ठ लोक से निकलकर उन पाप योनियों में जाओ जहाँ काम, क्रोध और लोभ रहते हैं। “

सनकादि के श्राप से व्याकुल होकर जय-विजय उनके चरणों में लोटकर क्षमा प्रार्थना करने लगे।

इधर जैसे ही श्री भगवान पद्मनाभ को विदित हुआ कि उनके पार्षदों ने सनकादि का अनादर किया है, वे तुरंत लक्ष्मी सहित वहाँ पहुँच गए।

भगवान को स्वयं वहाँ देखकर सनकादि की विचित्र दशा हो गयी। वे तुरंत भगवान को प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे।

तब भगवान सनकादि की प्रशंसा करते हुए बोले – ” ये जय-विजय मेरे पार्षद हैं। इन्होने आपका अपराध किया है। आपने इन्हें दंड देकर उचित ही किया है। ब्राह्मण मेरे परम आराध्य हैं।

मेरे अनुचरों के द्वारा आप लोगों का जो अनादर हुआ है, उसे मैं अपने द्वारा ही किया हुआ मानता हूँ। मैं आप लोगों से प्रसन्नता की भिक्षा मांगता हूँ। “

सनकादि ने प्रभु की अर्थपूर्ण और गंभीर वाणी सुनकर उनका गुणगान करते हुए कहा -” हे लक्ष्मीपति, आप सत्वगुण की खान और सभी जीवों के कल्याण के लिए सदा उत्सुक रहते हैं। हमने क्रोधवश इन्हें शाप दे दिया, इसके लिए हमें ही दण्डित करें, हमें सहर्ष स्वीकार है। “

दयामय प्रभु ने सनकादि से अत्यंत स्नेहपूर्वक कहा – ” आप सत्य समझिये, आपका यह शाप मेरी ही प्रेरणा से हुआ है। ये दैत्य योनि में जन्म तो लेंगे, पर क्रोधावेश से बढ़ी हुई एकाग्रता के कारण शीघ्र ही मेरे पास लौट आएंगे। “

सनकादि ऋषियों ने प्रभु की अमृतवाणी से प्रसन्न होकर उनकी परिक्रमा की और वहाँ से प्रस्थान कर गए।

सनकादि के जाने के बाद प्रभु ने जय-विजय से कहा – ” तुमलोग निर्भय होकर जाओ। तुम्हारा कल्याण होगा। मैं सर्वसमर्थ होकर भी ब्रह्मतेज की रक्षा चाहता हूँ , यही मुझे अभीष्ट है।

दैत्ययोनि में मेरे प्रति अत्यधिक क्रोध के कारण तुम्हारी जो एकाग्रता होगी , उससे तुम इस श्राप से मुक्त होकर कुछ ही समय में मेरे पास लौट आओगे। ”

लीलामय प्रभु की लीला का रहस्य देवताओं और ऋषियों को भी समझ में नहीं आता तो मनुष्यों की तो बात ही क्या।

प्रभु की इसी लीला के फलस्वरूप तपस्वी कश्यप मुनि जब सूर्यास्त के समय संध्या पूजन में लगे थे उसी समय उनकी पत्नी दक्षपुत्री दिति उनके समीप पहुँचकर संतान प्राप्त करने की कामना व्यक्त करने लगी।

महर्षि कश्यप ने उनकी इक्षापूर्ति का आश्वासन देते हुए असमय की ओर संकेत किया पर दिति के हठ के आगे उनकी एक न चली।

बाद में महर्षि कश्यप ने दिति देवी से कहा – ” तुमने चतुर्विध अपराध किया है। एक तो कामासक्त होने के कारण तुम्हारा चित्त मलिन था, दूसरे वह असमय था, तीसरे तुमने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है

और चौथे तुमने रूद्र आदि देवताओं का अनादर किया है। इस कारण तुम्हारे गर्भ से दो अत्यंत अधम और क्रूरकर्मा पुत्र उत्पन्न होंगे। उनके कुकर्मों एवं अत्याचारों से महात्मा पुरुष क्षुब्ध और धरती व्याकुल हो जाएगी।

वे इतने पराक्रमी और तेजस्वी होंगे की उनका वध करने के लिए स्वयं नारायण दो अलग अलग अवतार ग्रहण करेंगे। ”

दिति देवी कश्यप मुनि की बात सुनकर चिंतित हो गयी पर उन्हें इस बात का संतोष था कि उनके पुत्रों की मृत्यु स्वयं नारायण के हाथों होगी, जिससे उनका कल्याण हो जायेगा।

समय आने पर दिति ने दो जुड़वाँ पुत्र उत्पन्न किये। उन दैत्यों के धरती पर पैर रखते ही पृथ्वी, आकाश और स्वर्ग में अनेकों उपद्रव होने लगे।

वे दोनों दैत्य जन्म लेते ही पर्वताकार और परम पराक्रमी हो गए। प्रजापति कश्यप ने बड़े पुत्र का नाम ‘हिरण्यकश्यप‘ और छोटे का नाम ‘हिरण्याक्ष‘ रखा।

दोनों भाइयों में बड़ी प्रीति थी। दोनों एक दूसरे को अपने प्राणो से भी अधिक प्रेम करते थे। दोनों ही महाबलशाली, अमित पराक्रमी और आत्मबल संपन्न थे।

दोनों भाइयों ने युद्ध में देवताओं को पराजित करके स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। एक बार हिरण्याक्ष ने सोचा – ‘मृत्युलोक में रहने वाले पुरुष पृथ्वी पर रहकर यज्ञ पूजन आदि करेंगे जिससे देवताओं का बल और तेज बढ़ जायेगा। ‘

यह सोचकर उसने पृथ्वी को रसातल में ले जाकर छिपा दिया। यह देखकर सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी बहुत दुखी हुए और भगवान श्रीहरि का ध्यान किया।

अंतर्यामी भगवान श्रीविष्णु की स्मृति होते ही ब्रह्मा जी के नासिका से अंगूठे के बराबर एक श्वेत वराह शिशु निकला।

विधाता उसकी ओर आश्चर्य से देख ही रहे थे कि वह तत्काल विशाल हाथी के बराबर हो गया और फिर देखते देखते पर्वताकार हो गया। उन यज्ञमूर्ति वराह भगवान का गर्जन चारों तरफ गूंजने लगा।

वे घुरघुराते हुए और गरजते हुए मदमस्त हाथी के समान लीला करने लगे। उस समय मुनिगण प्रभु की प्रसन्नता के लिए उनकी स्तुति कर रहे थे।

भगवान स्वयं यज्ञपुरुष हैं तथापि सूकर रूप धारण करने के कारण अपनी नाक से सूंघ कर पृथ्वी का पता लगा रहे थे। उनकी दाढ़े बड़ी कठोर थीं और त्वचा पर कड़े कड़े बाल थे।

इस प्रकार वे बड़े क्रूर जान पड़ते थे पर अपनी स्तुति करने वाले मुनियों की ओर बड़ी सौम्य दृष्टि से निहारते हुए उन्होंने जल में प्रवेश किया।

भगवान वराह बड़े वेग से जल को चीरते हुए रसातल में जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने पृथ्वी को देखा और अपने दाढ़ों से पृथ्वी को उठाकर रसातल से बाहर निकले।

जल से बाहर निकलकर वे पृथ्वी को निर्दिष्ट स्थान पर स्थापित कर ही रहे थे कि हिरण्याक्ष वहाँ पहुँच गया। उसने वराह भगवान को युद्ध की चुनौती दी।

इसके बाद हिरण्याक्ष और वराह भगवान के बीच भयंकर संग्राम हुआ। इस युद्ध में वराह भगवान ने खेल खेल में ही हिरण्याक्ष का वध कर दिया।

इसके साथ ही देवतागण वराह भगवान की स्तुति करने लगे। फिर प्रभु ने वैष्णवों के हित के लिए कोकामुख तीर्थ में वराहरूप का त्याग किया।

पृथ्वी के उसी पुनः प्रतिष्ठा काल से श्वेतवाराह कल्प की सृष्टि प्रारम्भ हुई।

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