1 मत्स्य अवतार
मत्स्य अवतार / Matsya Avatar
सतयुग के आरम्भ में सत्यव्रत नाम से एक विख्यात राजर्षि हुए। राजा सत्यव्रत बड़े क्षमाशील, समस्त श्रेष्ठ गुणों से संपन्न और सुख-दुःख को समान समझने वाले एक वीर पुरुष थे।
वे पुत्र को राज्यभार सौंप कर स्वयं तपस्या करने वन में चले गए। एक दिन राजर्षि सत्यव्रत नदी में स्नान करके तर्पण कर रहे थे। इतने में ही जल के साथ एक छोटी सी मछली उनके अंजलि में आ गयी।
राजा ने जल के साथ ही उसे फिर से नदी में डाल दिया। तब उस मछली ने बड़ी करुणा के साथ राजा से कहा –
” राजन ! मेरी रक्षा कीजिये। आप जानते ही हैं कि जल में रहने वाले बड़े जीव अपने से छोटे जीवों को खा जाते हैं फिर आप मुझे इस जल में क्यों छोड़ रहे हैं ? “
राजा सत्यव्रत ने उस मछली की अत्यंत दीनतापूर्ण वाणी सुनकर उसे अपने कमंडल में रख लिया और आश्रम ले आये। एक ही रात में वह मछली इतनी बढ़ गयी कि कमंडल में उसके रहने के लिए स्थान ही नहीं बचा।
तब वह राजा से बोली – ” राजन ! अब तो कमंडल में मेरा निर्वाह नहीं हो सकता, अतः मेरे लिए कोई बड़ा सा स्थान ठीक कीजिये। “
तब राजर्षि सत्यव्रत ने उस मछली को कमंडल से निकाल कर एक पानी के मटके में रख दिया। पर दो घड़ी में ही वह वहाँ भी बढ़कर तीन हाथ की हो गयी।
फिर उसने राजा से कहा – ” राजन ! यह मटका भी अब मेरे लिए पर्याप्त नहीं है, अतः मुझे सुखपूर्वक रहने के लिए कोई दूसरा बड़ा सा स्थान दीजिये। “
राजा सत्यव्रत ने उस मछली को वहाँ से उठा कर एक बड़े सरोवर में डाल दिया पर कुछ ही समय में उस मछली ने उस सरोवर के जल को भी घेर लिया। तब हारकर राजा ने उसे समुद्र में डाल दिया।
समुद्र में छोड़े जाते समय उस लीला मत्स्य ने कहा – ” राजन ! समुद्र में बहुत से विशालकाय प्राणी रहते हैं, वे मुझे निगल जायेंगे, अतः आप मुझे समुद्र में मत डालिये। “
मत्स्य रूपधारी भगवान की बात सुनकर राजा सत्यव्रत की बुद्धि भ्रमित हो गयी। तब उन्होंने पुछा – ” मुझे मत्स्य रूप से मोहित करने वाले आप कौन हैं ?
आपने कुछ ही दिनों में अपने आकार से एक विशाल सरोवर को आच्छादित कर लिया। ऐसा पराक्रमी जीव मैंने आज तक न देखा है, ना ही सुना है।
निश्चय ही आप साक्षात् सर्वशक्तिमान सर्वव्यापी श्रीहरि हैं। हे पुरुषश्रेष्ठ, आपको नमस्कार है। कृपा करके यह बताएँ कि आपने यह मत्स्य रूप किस उद्देश्य से धारण किया है ? ”
राजा के इस प्रकार पूछने पर मत्स्य भगवान बोले – ” शत्रुसूदन ! आज से सातवें दिन तीनों लोक प्रलय समुद्र में निमग्न हो जायेंगे।
उस समय प्रलयकाल की जलराशि में त्रिलोकी के डूब जाने पर मेरी प्रेरणा से तुम्हारे पास एक विशाल नौका आएगी।
तब तुम समस्त औषधियों, छोटे बड़े सभी प्रकार के बीजों और प्राणियों के सूक्ष्म शरीरों को लेकर सप्तर्षियों के साथ उस बड़ी नाव पर चढ़ जाना और निश्चिंत होकर उस जल में विचरण करना।
उस समय प्रकाश नहीं रहेगा, केवल ऋषियों के दिव्य तेज का ही सहारा रहेगा। जब झंझावात के प्रचंड वेग से नाव डगमगाने लगेगी, उस समय मैं इसी रूप में तुम्हारे पास आऊँगा।
तब तुम वासुकि नाग के द्वारा उस नाव को मेरे सींग में बांध देना। इस प्रकार जब तक ब्रह्मा जी की रात रहेगी तब तक मैं उस नाव को प्रलय सागर में खींचता हुआ विचरण करूंगा।
उस समय तुम्हारे प्रश्न करने पर मैं उनका उत्तर दूंगा, जिनसे मेरी महिमा तुम्हारे ह्रदय में प्रस्फुटित हो जाएगी। “
यह कहकर मत्स्य भगवान अंतर्ध्यान हो गए।
राजर्षि सत्यव्रत भगवान के बताये हुए उस काल की प्रतीक्षा करने लगे। जब प्रलय का समय नजदीक आ गया तब सत्यव्रत अपने आश्रम के समीप आसन बिछाकर भगवान श्रीहरि के ध्यान में निमग्न हो गए।
इतने में ही राजा ने देखा कि समुद्र अपनी मर्यादा भंग करके चारों ओर से पृथ्वी को डुबाता हुआ बढ़ रहा है और उसी समय काले मेघ समस्त आकाश को आच्छादित करके भयंकर वर्षा करने लगे।
तब उन्होंने भगवान के आदेश का ध्यान किया और तभी कहीं से एक बड़ी सी नाव उनके सामने आकर रूक गयी। फिर राजा औषधि, बीज और प्राणियों के सूक्ष्म शरीरों को लेकर सप्तर्षियों के साथ उस नाव पर सवार हो गए।
तब सप्तर्षियों ने प्रसन्न होकर कहा – ” राजन ! केशव का ध्यान कीजिये। वे ही हमलोगों की इस संकट से रक्षा करेंगे। ”
इसके बाद राजा के ध्यान करते ही श्रीहरि मत्स्य रूप धारण करके उस प्रलय के जल में प्रकट हो गए। उनका शरीर स्वर्ण के समान देदीप्यमान तथा अत्यंत विशाल था। उनके एक सींग भी था।
राजा ने पूर्वकथनानुसार उस नाव को वासुकि नाग के द्वारा मत्स्य भगवान के सींग में बाँध दिया और स्वयं प्रसन्न होकर भगवान की स्तुति करने लगे।
राजा सत्यव्रत के स्तवन करने के बाद मत्स्य रूपधारी पुरुषोत्तम भगवान ने प्रलय जल में विहार करते हुए उन्हें तत्वज्ञान का उपदेश किया जो मत्स्य पुराण नाम से प्रसिद्ध है।
प्रलय के अंत में भगवान ने हयग्रीव नामक असुर को मारकर उससे वेद छीन लिए और ब्रह्मा जी को दे दिए।
भगवान की कृपा से राजा सत्यव्रत ज्ञान विज्ञान से संपन्न होकर इस कल्प में वैवस्वत मनु हुए।

Comments