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Showing posts from April, 2024

राजा हरिश्चंद्र

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राजा हरिश्चंद्र की कहानी एक बार राजा हरिश्चंद्र के सपने में गेरुआ वस्त्र धारण किए हुए एक साधु आए, जिन्होंने सम्राट से उनका पूरा राज पाठ दक्षिणी में मांगा लिया। राजा इतने दयालु थे, कि वह कभी भी अपने शरण में आए हुए किसी भी साधु को खाली हाथ नहीं लौटने देते थे, इसलिए राजा हरिश्चंद्र ने अपना पूरा राज्य उन साधु के नाम कर दिया। अगले दिन जब सवेरा हुआ तो राजा के दरबार में एक साधु ने दर्शन दिया। महाराजा हरिश्चंद्र को उस साधु ने अपना सपना याद करवाया, जिसमें उन्होंने अपना सारा राजपाट साधु के नाम कर दिया था। जैसे ही हरीश चंद्र जी को अपना सपना स्मरण हुआ, तो बिना किसी देरी के उन्होंने हामी भरी और अपना विशाल राज्य उन साधु के नाम कर दिया। दरअसल साधु के वेश में वह महात्मा और कोई नहीं, बल्कि स्वयं महर्षि विश्वामित्र थे जो राजा हरिश्चंद्र की परीक्षा लेने आए थे। इसके आगे साधु ने राजा से दक्षिणा की मांग की। हरीश चंद्र जी ने अपने सिपाहियों को शाही खजाने में से भेंट लाने के लिए कहा। लेकिन साधु ने उन्हें स्मरण कराया की राजा ने तो पहले ही सब कुछ साधु के नाम कर दिया है, तो वह राजकोष में से खजाना भला उन्हें दक्षि...

चौथ माता

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चौथ माता की कहानी  सेठ-सेठानी थे। उनके एक बेटा और बहू थे। बहू सबको भोजन कराके फिर स्वयं भोजन करती। एक पड़ोसन ऐसी भी थी, जो रोज पूछती कि बहू आज क्या बनाया-खाया है? बहू कहती- ठंडो बासी। एक दिन उसके पति ने ऐेसा सुनकर विचार किया कि आज तो पकवान बनाए जाएं, फिर देखें कि मेरी पत्नी क्या कहती है? उसने तरह-तरह के पकवान बनवाए और घर के सभी लोगों ने एकसाथ बैठकर भोजन किया। आज भी पड़ोसन ने पूछा तो बहू ने कहा ठंडो बासी। सेठ के लड़के ने सोचा, हो न हो कोई बात अवश्य है जिससे कि मेरी पत्नी ऐसा कहती है। उसने पत्नी से पूछा- तुम रोज 'ठंडो बासी खाया' ऐसा क्यों कहती हो, ज‍बकि अपन सबने एकसाथ बैठकर कई तरह के पकवान खाए? उसकी पत्नी बोली- अपन जो खा रहे हैं, वह बाप-बूढ़ों की कमाई है जिस दिन आप कमाकर लाओगे, उस दिन मैं समझूंगी कि ताजा भोजन कर रहे हैं।    अब एक दिन लड़के ने मां से कहा- मैं एक बड़े शहर में कमाई करने जा रहा हूं। मां बोली- बेटा, अपने पास इतना धन है कि 'खाया नहीं खुटेगा'। मां के मना करने पर भी बेटे ने स्वयं कमाने का दृढ़ निश्चय कर लिया और जाते समय पत्नी से कहा- 'मैं जब तक कमाकर बहुत-सा ...

रावण के जन्म की कहानी

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रावण के जन्म की कहानी (Ravan ke janam ki kahani) पूर्वकाल में ब्रह्मा जी ने अनेक जल-जन्तु बनाये और उनसे समुद्र के जल की रक्षा करने के लिये कहा। तब उन जन्तुओं में से कुछ बोले कि हम इसका रक्षण (रक्षा) करेंगे और कुछ ने कहा कि हम इसका यक्षण (पूजा) करेंगे। इस पर ब्रह्माजी ने कहा कि जो रक्षण करेगा वह राक्षस कहलायेगा और जो यक्षण करेगा वह यक्ष कहलायेगा। इस प्रकार वे दो जातियों में बँट गये। पौराणिक काल में राक्षसों में हेति और प्रहेति दो भाई थे। प्रहेति तपस्या करने चला गया, परन्तु हेति ने भया से विवाह किया जिससे उसके विद्युत्केश नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। विद्युत्केश के सुकेश नामक पराक्रमी पुत्र हुआ। सुकेश के माल्यवान, सुमाली और माली नामक तीन पुत्र हुए। तीनों ने ब्रह्मा जी की तपस्या करके यह वरदान प्राप्त कर लिये कि हम लोगों का प्रेम अटूट हो और हमें कोई पराजित न कर सके। वर पाकर वे निर्भय हो गये और सुरों, असुरों को सताने लगे। उन्होंने विश्‍वकर्मा से एक अत्यन्त सुन्दर नगर बनाने के लिये कहा। इस पर विश्‍वकर्मा ने उन्हें लंका पुरी का पता बता कर भेज दिया। वहाँ वे बड़े आनन्द के साथ रहने लगे। माल्यवान के व...

अक्षय तृतीया( आखा तीज)

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इस वर्ष अक्षय तृतीया का पर्व शुक्रवार, 10 मई  को मनाया जाएगा। वैदिक पंचांग के अनुसार वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि की शुरुआत 10 मई को सुबह 4 बजकर 17 मिनट पर होगी। वहीं इस तृतीया तिथि का समापन 11 मई 2024 को सुबह 02 बजकर 50 मिनट पर होगी। उदया तिथि के आधार पर 10 मई को अक्षय तृतीया का पर्व मनाया जाएगा। अक्षय तृतीया का पर्व हर साल वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। यह व्रत गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश सहित पूरे उत्तर भारत में मनाया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में इसे आखातीज या अक्खा तीज कहते हैं। आओ जानते हैं इस संबंध में पौराणिक तथ्य।. अक्षय तृतीया को 'अखा तीज' भी कहा जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ऐसी मान्यता है कि इसी दिन भगवान परशुराम, नर-नारायण और हयग्रीव का अवतार हुआ था 1. इस दिन भगवान नर-नारायण सहित परशुराम और हयग्रीव का अवतार हुआ था।    2. इसी दिन ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का जन्म भी हुआ था। कुबेर को खजाना मिला था।   3. इसी दिन बद्रीनारायण के कपाट भी खुलते हैं। जगन्नाथ भगवान के सभी रथों को बनाना...

हनुमान जयंती

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हनुमान जयंती  हनुमान जन्मोत्सव एक हिंदू त्योहार है जो हिंदू देवता और रामायण के नायकों में से एक हनुमान के जन्म का जश्न मनाता है । हनुमान जन्मोत्सव का उत्सव भारत के प्रत्येक राज्य में समय और परंपरा के अनुसार अलग-अलग होता है। भारत के अधिकांश उत्तरी राज्यों में, यह त्यौहार हिंदू महीने चैत्र (चैत्र पूर्णिमा) की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। कर्नाटक में , हनुमान जन्मोत्सव मार्गशीर्ष माह के दौरान या वैशाख माह में शुक्ल पक्ष त्रयोदशी को मनाया जाता है, जबकि केरल और तमिलनाडु जैसे कुछ राज्यों में , यह धनु माह ( तमिल में मार्गाली कहा जाता है) के दौरान मनाया जाता है। ). हनुमान जन्मोत्सव पूर्वी राज्य ओडिशा में पाना संक्रांति पर मनाया जाता है , जो उड़िया नव वर्ष के साथ मेल खाता है। हनुमान को विष्णु के अवतार राम का प्रबल भक्त माना जाता है , जो अपनी अटूट भक्ति के लिए व्यापक रूप से जाने जाते हैं। उन्हें शक्ति के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है। जन्म हनुमान एक वानर हैं , जिनका जन्म केसरी और अंजना से हुआ था । हनुमान को पवन-देवता वायु के दिव्य पुत्र के रूप में भी जाना जाता है । उनकी माता अंजना एक अप्स...

9 सिद्धिदात्री माँ कथा

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 सिद्धिदात्री माँ कथा माँ दुर्गाजी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। नवरात्रि-पूजन के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। सृष्टि में कुछ भी उसके लिए अगम्य नहीं रह जाता है। ब्रह्मांड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें आ जाती है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व- ये आठ सिद्धियां होती हैं। ब्रह्मवैवर्तपुराण के श्रीकृष्ण जन्म खंड में यह संख्या अठारह बताई गई है। सिद्धि मां सिद्धिदात्री भक्तों और साधकों को ये सभी सिद्धियां प्रदान करने में समर्थ हैं। देवीपुराण के अनुसार भगवान शिव ने इनकी कृपा से ही इन सिद्धियों को प्राप्त किया था। इनकी अनुकम्पा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण वे लोक में ‘ अर्द्धनारीश्वर ’ नाम से प्रसिद्ध हुए। मां सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं। इनका वाहन सिंह है। ये कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं। इनकी दाहिनी तरफ के नीचे वा...

8 मां महागौरी की कथा

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 मां महागौरी की कथा नवरात्रि हिंदू धर्म का बहुत ही पवित्र त्यौहार है। यह 9 रात और 10 दिनों के लिए मनाया जाता है। भले ही देश के उत्तरी और पश्चिमी हिस्से में इसे दशहरे के रूप में मनाया जाता हो, लेकिन भारत के पूर्वी राज्यों में दुर्गा पूजा के रूप में भी जाना जाता है। नवरात्रि के नौ दिन माँ दुर्गा के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है। जिसमें नवरात्रि का पहला दिन दिन मां शैलपुत्री से शुरू होता है, और उसके बाद मां चंद्रघंटा, मां कुष्मांडा, मां कात्यायनी और मां दुर्गा के अन्य अवतारों की पूजा की जाती है। नवरात्रि के आठवें दिन नवदुर्गा के आठवें स्वरूप महागौरी की पूजा-अर्चना की जाती है। ऐसी मान्यता है कि महागौरी राहु ग्रह को नियंत्रित करती है। जिसे एक अशुभ ग्रह भी माना जाता है। बैल पर बैठने के कारण इनको वृषारूढ़ा भी कहा जाता है। मां महागौरी की चार भुजाएँ बताई गई है। जिनमें उन्होंने एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे हाथ में डमरू, तीसरा हाथ अभय मुद्रा में और चौथा हाथ में वरद मुद्रा बनाये हुए है। मां महागौरी की पूजा: शक्ति का आठवां अवतार नवरात्रि का आठवां दिन मां महागौरी की पूजा को समर्पित है। जिसमें ‘म...

7कालरात्रि माता की कथा (Kalratri mata story)

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 कालरात्रि माता की कथा (Kalratri mata story) पौराणिक कथाओं के अनुसार शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज नामक तीन दुष्ट दैत्य थे। इन तीनों ने मिलकर तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया था। समस्त प्राणियों और देवताओं के सामने जीवन संकट उत्पन्न हो गया था। इन दुष्ट दैत्यों के बल के आगे कोई भी अस्त्र-शस्त्र टिक नहीं पा रहा था। परेशान होकर सभी देवतागण भगवान शिव के पास पहुंचे और उनसे समस्त प्राणियों और अपने प्राणों की रक्षा की गुहार लगाई। शिवजी ने देवताओं की व्यथा को समझते हुए उन्हे शीघ्र हीं इस संकट से छुटकारा दिलाने एवं समस्त प्राणियों की सुरक्षा का वचन दिया।   शंकर जी को पता था की इस दैत्य का संहार माता पार्वती हीं कर सकती हैं। तत्पश्चात भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा की ‘आप आदिशक्ति जगतजननी हैं, आपके तेज का सामना तीनों लोकों मे कोई नहीं कर सकता है ,  आप इन दुष्ट राक्षसों का वध करके इस सृष्टि की रक्षा करें।’ शिवजी की आज्ञा पाकर माता पार्वती ने दुर्गा का रूप धारण किया और शुंभ-निशुंभ एवं रक्तबीज का वध करने निकल पड़ीं। मगर उन दानवों को समाप्त करने मे एक विकराल समस्या थी। रक्तबीज को यह वरदान मि...

6 कात्यायनी माता की कथा (Katyayani mata story)

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  कात्यायनी माता की कथा (Katyayani mata story) कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि थे। उनके पुत्र का नाम कात्य ऋषि था। इन्हीं कात्य ऋषि के गोत्र में अति-प्रसिद्ध महर्षि कात्यायन का जन्म हुआ। महर्षि कात्यायन माँ पराम्बा के परम भक्त थे। महर्षि कात्यायन की प्रबल इच्छा थी कि माँ भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें। माँ पराम्बा की उपासना करते हुए उन्होने बहुत वर्षों तक बड़ी कठोर तपस्या की। माँ भगवती ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर महर्षि कात्यायन के घर मे जन्म लेना स्वीकार कर लिया। आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को ये महर्षि कात्यायन की पुत्री के रूप मे माताजी का जन्म हुआ। जन्म के उपरांत कात्यायन ऋषि ने माता आदिशक्ति की विधिवत पूजा का आयोजन किया। शुक्ल सप्तमी, अष्टमी तथा नवमी तक-तीन दिन-इन्होंने कात्यायन ऋषि की पूजा ग्रहण कर के दशमी को महिषासुर का वध कर दिया था। महिषासुर का वध करने के पश्चात समस्त देव-मानव लोकों मे माँ दुर्गा की जय जयकार होने लगी। कात्यायन ऋषि की पुत्री होने के कारण ये माताजी ‘कात्यायनी’ के नाम से विख्यात हुईं।  दूसरी कथा के अनुसार- जब दानव महिषासुर का अत्याचार पृथ्वी पर बहुत बढ...

5 स्कन्दमाता’ की कथा

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स्कंदमाता की कथा (Skandmata Story): जब राजा दक्ष के यज्ञ मे माता सती अग्निकुंड मे कूदकर भस्म हो गयीं, तब शिवजी विलाप करते हुए गहरी तपस्या मे लीन हो गए, इससे सृष्टि शक्तिहीन हो गई, असुरों ने इस मौके का लाभ उठाया। पौराणिक कथाओं मे वर्णित है, एक असुर (राक्षस) था जिसका नाम तारकासुर था। उसने अपनी कठोर तपस्या से ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर अमर होने का वरदान मांगा तब ब्रह्मा जी ने कहा- इस धरती पर जिसका जन्म हुआ है उसका मरना निश्चित है। कोई भी अमर नहीं हो सकता है तुम कोई और वर मांगो। यह सुनकर तारकासुर बहुत दुखी हो गया। कुछ देर सोचने के बाद तारकासुर ने कुटिल मुस्कान के साथ कहा की मुझे यह वरदान दीजिये की मेरी मृत्यु भगवान शिव के पुत्र के हाथो हो। ब्रह्मा जी ने कहा तथास्तु! और अंतर्ध्यान हो गए। तारकासुर ने यह सोच लिया था की भगवान शिव तो ‘माता सती’ के वियोग मे अनादि काल तक तपस्या मे लीन रहेंगे, और माता सती का स्थान शंकर जी किसी और को कभी नहीं देंगे, अतः वे तो अब विवाह करेंगे ही नहीं, और उसकी मृत्यु जो की शंकर जी के पुत्र के हाथों होनी है, बिना शिवजी के विवाह किए उसका जन्म लेना भी संभव नहीं है। एक प्र...

4 माता कूष्माण्डा की कथा

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माता कूष्माण्डा की कथा माता कूष्माण्डा का जन्म कैसे हुआ? इस कथा में हम जानेंगे की माता दुर्गा का चतुर्थ रूप कौन सा हैं? नवरात्री के चौथे दिन किनकी पूजा होती है? माता कूष्माण्डा का जन्म कैसे हुआ? माता कूष्माण्डा का मंत्र क्या है? माता कूष्माण्डा की पूजा कैसे करे? और माता कूष्माण्डा की आरती माँ दुर्गा के चौथे रूप का नाम कूष्माण्डा है। नवरात्र के चौथे दिन कूष्माण्डा देवी के स्वरूप की ही उपासना की जाती है। अपनी मंद, हल्की हंसी के द्वारा अण्ड यानी ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इस देवी को कुष्मांडा नाम से अभिहित किया गया है। जब सृष्टि नहीं थी, चारों तरफ अंधकार ही अंधकार था, तब इसी देवी ने अपने ईषत्‌ हास्य से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसीलिए इसे सृष्टि की आदिस्वरूपा या आदिशक्ति कहा गया है। इस देवी की आठ भुजाएं हैं, इसलिए अष्टभुजा कहलाईं। इनके सात हाथों में क्रमशः कमण्डल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा हैं। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जप माला है। इस देवी का वाहन सिंह है और इन्हें कुम्हड़े की बलि प्रिय है। संस्कृत में कुम्हड़े को कुष्मांड कहते हैं इ...

3 माता चंद्रघंटा की कथा

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माता चंद्रघंटा की कथा पौराणिक कथा ये है कि एक बार महिषासुर नाम के एक राक्षस ने स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया। उसने देवराज इंद्र को युद्ध में हराकर स्वर्गलोक पर विजय प्राप्त कर ली और स्वर्गलोक पर राज करने लगा। युद्ध में हारने के बाद सभी देवता इस समस्या के निदान के लिए त्रिदेवों के पास गए। देवताओं ने भगवान विष्णु, महादेव और ब्रहमा जी को बताया कि महिषासुर ने इंद्र, चंद्र, सूर्य, वायु और अन्‍य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिए हैं और उन्हे बंदी बनाकर स्वर्ग लोक पर कब्जा कर लिया है। महिषासुर के अत्याचार के कारण देवताओं को धरती पर निवास करना पड़ रहा है। देवताओं की बात सुनकर त्रिदेवों को अत्यधिक क्रोध आ गया और उनके मुख से ऊर्जा उत्पन्न होने लगी। इसके बाद यह ऊर्जा दसों दिशाओं में जाकर फैल गई। उसी समय वहां पर देवी चंद्रघंटा ने अवतार लिया। भगवान शिव ने देवी को त्रिशूल, विष्णु जी ने चक्र दिया। इसी तरह अन्य देवताओं ने भी मां चंद्रघंटा को अस्त्र शस्त्र प्रदान किए। इंद्र ने मां को अपना वज्र और घंटा प्रदान किया। भगवान सूर्य ने मां को तेज और तलवार दिए। इसके बाद मां चंद्रघंटा को सवारी के लिए शेर भी दिया गया। मा...

2 मां ब्रह्मचारिणी की कथा

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  मां ब्रह्मचारिणी की कथा मां ब्रह्मचारिणी ने अपने पूर्व जन्म में राजा हिमालय के घर में पुत्री रूप में लिया था. तब देवर्षि नारद के उपदेश से इन्होंने भगवान शंकर को अपने पति रूप में प्राप्त करने के लिए अत्यंत कठिन तपस्या की थी. इस दुष्कर तपस्या के कारण इन्हें तपस्चारिणी अर्थात ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया. कथा के अनुसार एक हज़ार वर्ष उन्होंने केवल फल, मूल खाकर व्यतीत किए और सौ वर्षों तक केवल शाक पर निर्वाह किया था. कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखते हुए देवी ने खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के भयानक कष्ट भी सहे. मैना मां हो गईं दुखी कई हज़ार वर्षों की इस कठिन तपस्या के कारण ब्रह्मचारिणी देवी का शरीर एकदम क्षीण हो उठा, उनकी यह दशा देखकर उनकी माता मैना अत्यंत दुखी हुई और उन्होंने उन्हें इस कठिन तपस्या से विरक्त करने के लिए आवाज़ दी उ...मां... तब से देवी ब्रह्मचारिणी का एक नाम उमा भी पड़ गया. उनकी इस तपस्या से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया. देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी देवी ब्रह्मचारिणी की इस तपस्या को अभूतपूर्व पुण्यकृत्य बताते हुए उनकी सराहना करने लगे. आकाशवाणी ने दी तपस्या फलित की सू...

नवरात्रि की नौ देवियाँ के नाम (9 Durga mata names)

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नवरात्रि की नौ देवियाँ के नाम  शैलपुत्री – पहाड़ो की पुत्री ब्रह्मचारिणी – ब्रह्मचारीणी चंद्रघंटा– चाँद की तरह चमकने वाली कूष्माण्डा –पूरा जगत उनके पैर में स्कंदमाता –कार्तिक स्वामी की माता कात्यायनी –कात्यायन आश्रम में जन्मि कालरात्रि –काल का नाश करने वली महागौरी –सफेद रंग वाली मां सिद्धिदात्री –सर्व सिद्धि देने वाली मां शैलपुत्री की कहानी मां शैलपुत्री सती के नाम से भी जानी जाती हैं। इनकी कहानी इस प्रकार है - एक बार प्रजापति दक्ष ने यज्ञ करवाने का फैसला किया। इसके लिए उन्होंने सभी देवी-देवताओं को निमंत्रण भेज दिया, लेकिन भगवान शिव को नहीं। देवी सती भलीभांति जानती थी कि उनके पास निमंत्रण आएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वो उस यज्ञ में जाने के लिए बेचैन थीं, लेकिन भगवान शिव ने मना कर दिया। उन्होंने कहा कि यज्ञ में जाने के लिए उनके पास कोई भी निमंत्रण नहीं आया है और इसलिए वहां जाना उचित नहीं है। सती नहीं मानीं और बार बार यज्ञ में जाने का आग्रह करती रहीं। सती के ना मानने की वजह से शिव को उनकी बात माननी पड़ी और अनुमति दे दी। सती जब अपने पिता प्रजापित दक्ष के यहां पहुंची तो देखा कि कोई भी उनसे...

Ram Navami 2024 (राम नवमी 2024)

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Ram Navami ( राम नवमी कब?) राम नवमी का पर्व चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के दिन मनाया जाता है। भगवान राम के जन्मोत्सव के रुप में रामनवमी का पर्व मनाया जाता है। आइए जानते हैं रामनवमी का पर्व कब मनाया जाएगा। साथ ही जानें मुहूर्त पूजा विधि और महत्व। ram navmi 2024 date राम नवमी का पर्व भगवान राम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, भगवान राम का जन्म चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के दिन कर्क लग्न में अभिजीत मुहूर्त में हुआ था। रामनवमी का पर्व चैत्र मास की नवरात्रि के आखिरी दिन होता है। रामनवमी का पर्व भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस बार नवरात्रि का आरंभ 9 अप्रैल से हो रहा है। ऐसे में आइए जानते हैं राम नवमी का पर्व कब मनाया जाता है। चैत्र मास रामनवमी कब है? पंचांग के अनुसार, चैत्र मास की नवमी तिथि का आरंभ 16 अप्रैल के दिन मंगलवार को दोपहर 1 बजकर 23 मिनट से प्रारंभ होगा और नवमी तिथि 17 जनवरी को दोपहर 3 बजकर 15 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि में नवमी तिथि होने के कारण रामनवमी का पर्व 17 अप्रैल को मनाया ...

Chaitra Navratri 2024

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Chaitra Navratri 2024: इस दिन से शुरू हो रहा है चैत्र नवरात्र, यहां देखें कलश स्थापना और बाकी दिन का कैलेंडर Chaitra Navratri 2024 नवरात्र के नौ दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है। हिंदू पंचांग के अनुसार साल में चार बार नवरात्रि आती हैं जिनमें से एक शारदीय नवरात्र एक चैत्र और दो गुप्त नवरात्र होते हैं। चैत्र माह में पड़ने वाली चैत्र नवरात्र का विशेष महत्व है। ऐसे में जानते हैं कि साल 2024 में चैत्र नवरात्र कब से शुरू हो रहे हैं। हिंदू धर्म में नवरात्र की अवधि मां दुर्गा की आराधना के लिए समर्पित मानी जाती है। प्रति वर्ष चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से चैत्र नवरात्र की शुरुआत होती है। इस साल 8 अप्रैल, 2024 से चैत्र नवरात्र का शुभारंभ होने जा रहा है। ऐसे में आइए जानते हैं चैत्र नवरात्र पर  चैत्र नवरात्र का शुभारंभ चैत्र माह की प्रतिपदा तिथि का प्रारंभ 08 अप्रैल 2024 को रात में 11 बजकर 50 मिनट पर हो रहा है। साथ ही इसका समापन  09 अप्रैल रात 08 बजकर 30 मिनट पर होगा। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार, चैत्र माह का आरंभ 09 अप्रैल, मंगलवार के दिन से ...

दशा माता की कथा

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दशा माता की कथा | Dasha Mata Vrat Katha In Hindi सालों पहले नल नामक एक राजा राज किया करते थे। उनकी पत्नी का नाम दमयंती था। दोनों अपने दो बेटों के साथ सुखी जीवन जी रहे थे। राजा के शासन में प्रजा भी काफी समृद्ध और सुखी थी। कुछ समय बाद होली दशा का त्योहार आया। दोपहर के समय जब रानी अपने कमरे में आराम कर रही थी, तो एक ब्राह्मण महिला राजमहल आईं और रानी से मुलाकात करने की इच्छा जताई। आज्ञा मिलने पर उस ब्राह्मणी को रानी के पास ले जाया गया। रानी के पास पहुंचकर उस महिला ने कहा, “हे महारानी! ये दशा डोरी तुम ले लो।” इस पर वहां खड़ी दासी भी बोली, “हां महारानी, आज होली दशा है और आज के दिन विवाहित महिलाएं दशा माता का व्रत करती हैं। इस व्रत में महिलाएं इसी डोरी की आराधना कर उसे अपने गले में बांधती हैं। इसे बांधने से घर की सुख-शांति बनी रहती है।” दासी की इस बात को सुनने के बाद रानी दमयंती ने उस डोरी की पूजा कर उसे अपने गले में बांध लिया। कुछ दिन बीतने के बाद राजा नल ने अपनी पत्नी के गले में उस डोरी को बंधा देखा। उसे देखते ही राजा ने अपनी पत्नी से पूछा, “हे प्रिय! आपके पास इतने सोने के हार होने के बावजू...