5 स्कन्दमाता’ की कथा
स्कंदमाता की कथा (Skandmata Story):
जब राजा दक्ष के यज्ञ मे माता सती अग्निकुंड मे कूदकर भस्म हो गयीं, तब शिवजी विलाप करते हुए गहरी तपस्या मे लीन हो गए, इससे सृष्टि शक्तिहीन हो गई, असुरों ने इस मौके का लाभ उठाया।
पौराणिक कथाओं मे वर्णित है, एक असुर (राक्षस) था जिसका नाम तारकासुर था। उसने अपनी कठोर तपस्या से ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर अमर होने का वरदान मांगा तब ब्रह्मा जी ने कहा- इस धरती पर जिसका जन्म हुआ है उसका मरना निश्चित है। कोई भी अमर नहीं हो सकता है तुम कोई और वर मांगो। यह सुनकर तारकासुर बहुत दुखी हो गया। कुछ देर सोचने के बाद तारकासुर ने कुटिल मुस्कान के साथ कहा की मुझे यह वरदान दीजिये की मेरी मृत्यु भगवान शिव के पुत्र के हाथो हो। ब्रह्मा जी ने कहा तथास्तु! और अंतर्ध्यान हो गए।
तारकासुर ने यह सोच लिया था की भगवान शिव तो ‘माता सती’ के वियोग मे अनादि काल तक तपस्या मे लीन रहेंगे, और माता सती का स्थान शंकर जी किसी और को कभी नहीं देंगे, अतः वे तो अब विवाह करेंगे ही नहीं, और उसकी मृत्यु जो की शंकर जी के पुत्र के हाथों होनी है, बिना शिवजी के विवाह किए उसका जन्म लेना भी संभव नहीं है।
एक प्रकार से तारकासुर स्वयं को अमर हीं समझ बैठा था।
वह बहुत ही शक्तिशाली और क्रूर था। यह वरदान मिलने के बाद उसने देवताओं पर अत्याचार करना शुरू कर दिया। देवतागण बहुत परेशान हो गए और उन्होंने ब्रह्मा जी से मदद मांगी। ब्रह्मा जी ने कहा- तारकासुर का अंत शिवपुत्र ही कर सकते हैं।
यह सुनकर इन्द्र और समस्त देवतागण भगवान शिव के पास पहुँचकर इस सृष्टि को तारकासुर से मुक्ति दिलाने का निवेदन किया। शिवजी ने सभी देवताओं को इस समस्या से मुक्त कराने का वचन दिया।
तब भगवान् शंकर, पार्वती के अपने प्रति अनुराग की परीक्षा लेते हैं और माता पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर उनसे विवाह करते हैं।
विवाह के बाद शिव-पार्वती के पुत्र स्कन्द (कार्तिकेय) का जन्म हुआ। कार्तिकेय बाल अवस्था से हीं बहुत वीर और शक्तिशाली थे। उन्होने दुष्ट असुरों का संहार शुरू कर दिया।
अंतत: वो समय भी आ गया जिसकी देवताओं को युगों से प्रतीक्षा थी। उन्होंने तारकासुर से युद्ध किया। एक भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया। देवताओं ने कार्तिकेय की वीरता की प्रशंसा की और उन्हें देवताओं का सेनापति बनाया।
भगवान् शंकर के दूसरे पुत्र थे “स्कन्द” जिन्हे सुब्रमण्यम, मुरूगन और कार्तिकेय के नाम से भी जाना जाता है। इनकी पूजा मुख्य रूप से दक्षिण भारत के राज्यों मे होती है, ऐसी मान्यता है की दक्षिणी ध्रुव के निकतव्रती प्रदेश उत्तरी कुरु के क्षेत्र मे इन्होने स्कन्द नाम से शासन किया था। इनके नाम से ही हिन्दु धर्म के एक पौराणिक ग्रंथ का नाम ‘स्कन्द पुराण’ है।

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