बाबा रामदेव जी की जन्मकथा (Baba Ramdev KI Khata)

 बाबा रामदेव जी की जन्मकथा (Baba Ramdev KI Khata)

राजा अजमल जी द्वारिका‍नाथ के परमभक्त होते हुए भी उनको दु:ख था उनके कोई पुत्र नहीं था। दूसरा दु:ख था कि उनके ही राज्य में पड़ने वाले पोकरण से 3 मील उत्तर दिशा में भैरव राक्षस ने परेशान कर रखा था।


राजा अजमल जी पुत्र प्राप्ति के लिये दान पुण्य करते, साधू सन्तों को भोजन कराते, यज्ञ कराते, नित्य ही द्वारिका‍नाथ की पूजा करते थे। भैरव राक्षस को मारने का उपाय सोचते हुए राजा अजमल जी द्वारका जी पहुंचे। जहां अजमल जी को भगवान के साक्षात दर्शन हुए, राजा के आखों में आंसू देखकर भगवान में अपने पिताम्बर से आंसू पोछकर कहा, हे भक्तराज रो मत मैं तुम्हारा सारा दु:ख जानता हूँ। मैं तेरी भक्ति देखकर बहुत प्रसन्न हूँ।

भगवान की असीम कृपा प्राप्त कर राजा अजमल जी बोले हे प्रभु अगर आप मेरी भक्ति से प्रसन्न हैं तो मुझे आपके समान पुत्र चाहिये, आपको मेरे घर पुत्र बनकर आना पड़ेगा और राक्षस को मारकर धर्म की स्थापना करनी पड़ेगी।भगवान श्रीकृष्ण ने इस पर उन्हें आश्वस्त किया कि वे स्वयं उनके घर अवतार लेंगे। बाबा रामदेव के रूप में जन्मे श्रीकृष्ण संवत् 1409 में भाद्र मास की दूज को पालने में खेलते अवतरित हुए और अपने चमत्कारों से लोगों की आस्था का केंद्र बनते गए। इसीलिए बाबा रामदेव को कृष्ण (द्वारिका‍नाथ) का अवतार माना जाता है।

रामापीर बनने का रहस्य

बाबा रामदेवजी के चमत्कार की परीक्षा लेने मुल्तान से 5 पीर रुणिचा पहुंचे। इस दौरान रामदेवजी ने पीरों का जोरदार आवभगत की और ‘‍अतिथि देवो भव:‘ की भावना से उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया। जब भोजन कराने के लिए बाबा ने पीरों के लिए जाजम लगाई तो पीरों ने कहा कि वे केवल अपने स्वयं के बर्तनों में ही भोजन करते हैं। दूसरों के बर्तनों में भोजन नहीं करते हैं यह उनका प्रण है। लेकिन सारे बर्तन मुल्तान में छोड़ आए हैं। आप यदि मुल्तान से वे कटोरे मंगवा सकते हैं तो मंगवा दीजिए, वर्ना हम आपके यहां भोजन नहीं कर सकते।

तब बाबा रामदेव ने उन्हें विनयपूर्वक कहा कि उनका भी प्रण है कि घर आए अतिथि को बिना भोजन कराए नहीं जाने देते। यदि आप अपने बर्तनों में ही खाना चाहते हैं तो ऐसा ही होगा। इस पर रामदेवजी ने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए उनके बर्तनों को उनके सामने रखकर चमत्कार कर दिया। इस चमत्कार (परचा) से वे पीर सकते में रह गए। तब उन पीरों ने कहा कि आप तो पीरों के पीर हैं।

इसे देखकर पांचों पीरों ने उन्हें दुनिया में रामशापीर, रामापीर, रामपुरी, हिंदवपीर के नाम से पहचाने जाने का आशिर्वाद दिया। इस तरह से पीरों ने भोजन किया और श्रीरामदेवजी को ‘पीर’ की पदवी मिली और रामदेवजी, रामापीर कहलाए।

समाधि के अंतिम वक़्त रामापीर ने दिया था ये उपदेश

श्रद्धालुओं में मान्यता है कि भाद्रपद शुक्ल दशमी को बाबा रामदेव ने जीवित समाधि ली थी। बताया जाता है कि रामदेव जी ने अपने हाथ से श्रीफल लेकर सब बड़े बुजुर्गों को प्रणाम किया और श्रद्धा से अन्तिम पूजन किया था। साथ ही रामदेव जी ने समाधी में खड़े होकर अन्तिम उपदेश देते हुए कहा कि प्रति माह की शुक्ल पक्ष की दूज को पूजा पाठ, भजन कीर्तन करके पर्वोत्सव मनाना, रात्रि जागरण करना। बाबा ने जाते-जाते अपने ग्रामीणों को कहा कि इस युग में न तो कोई ऊँचा हैं, और न ही कोई नीचा, सभी जन एक समान हैं। सभी को एक समान ही समझना और उनमे किसी भी प्रकार का भेद न करना। मेरे जन्मोत्सव पर समाधि स्थल पर मेला लगेगा। मेरे समाधि पूजन में भ्रान्ति व भेद भाव मत रखना। मैं सदैव अपने भक्तों के साथ रहुंगा।

श्री रामदेव जी की आरती
जय श्री रामदेव अवतारी, कलयुग में धणी आप पधारे ।

सतयुग में बाबा विष्‍णु बन आए, मधु-कटैभ को मार गिराये
ब्रह्मा जी को आप ऊबारो, देव श्री कहलाये ।। जय श्री रामदेव…

त्रेता में बाबा राम बन आए, रावण को मार गिराये
महाबीर की आप उबारो, पुरूषोत्‍तम कहलाये ।। जय श्री रामदेव…

द्वापर में बाबा कृष्‍ण बन आए, कंस को मार गिराये
सुदामा को आप उबारो, वासुदेव कहलाये ।। जय श्री रामदेव…

कलयुग में बाबा रामदेव बन आए, भैरों-राकस को मार गिराये
बोहिता बनिए को आप उबारो, रामपीर कहलाये ।। जय श्री रामदेव…

माता मैनादे पिता अजमाल जी, बाबा संग में डाली आये
देबो साबो पुत्र थारे, नेतली कहलाये ।। जय श्री रामदेव…

श्री रामपीर की आरती, जो कोई नर गाये
जन्‍म-जन्‍म के कष्‍ट मिटे, भव सागर तर जाये ।। जय श्री रामदेव…

जय श्री रामदेव अवतारी, कलयुग में धणी आप पधारे ।


जै बाबा रामदेव्… पीरों के पीर रामापीर, हरे सब की पीर..!!

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