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Showing posts from May, 2024

बृहस्पतिदेव की कथा (Shri Brihaspatidev Ji Vrat Katha)

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बृहस्पतिदेव की कथा (Shri Brihaspatidev Ji Vrat Katha) भारतवर्ष में एक प्रतापी और दानी राजा राज्य करता था। वह नित्य गरीबों और ब्राह्मणों की सहायता करता था। यह बात उसकी रानी को अच्छी नहीं लगती थी, वह न ही गरीबों को दान देती, न ही भगवान का पूजन करती थी और राजा को भी दान देने से मना किया करती थी। एक दिन राजा शिकार खेलने वन को गए हुए थे, तो रानी महल में अकेली थी। उसी समय बृहस्पतिदेव साधु वेष में राजा के महल में भिक्षा के लिए गए और भिक्षा माँगी रानी ने भिक्षा देने से इन्कार किया और कहा: हे साधु महाराज मैं तो दान पुण्य से तंग आ गई हूँ। मेरा पति सारा धन लुटाते रहिते हैं। मेरी इच्छा है कि हमारा धन नष्ट हो जाए फिर न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। साधु ने कहा: देवी तुम तो बड़ी विचित्र हो। धन, सन्तान तो सभी चाहते हैं। पुत्र और लक्ष्मी तो पापी के घर भी होने चाहिए। यदि तुम्हारे पास अधिक धन है तो भूखों को भोजन दो, प्यासों के लिए प्याऊ बनवाओ, मुसाफिरों के लिए धर्मशालाएं खुलवाओ। जो निर्धन अपनी कुंवारी कन्याओं का विवाह नहीं कर सकते उनका विवाह करा दो। ऐसे और कई काम हैं जिनके करने से तुम्हारा यश लोक-परलोक मे...

प्रेम मंदिर

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                                        प्रेम मंदिर प्रेम मंदिर भारत में उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा जिले के समीप वृंदावन में स्थित है।  इसका निर्माण जगद्गुरु कृपालु महाराज द्वारा भगवान कृष्ण और राधा के मन्दिर के रूप में करवाया गया है । मन्दिर का लोकार्पण १७ फरवरी को किया गया था। इस मन्दिर के निर्माण में ११ वर्ष का समय और लगभग १०० करोड़ रुपए की धन राशि लगी है। Video- 

विष्णु पुराण सम्पूर्ण कथा – (Vishnu Puran Katha in Hindi) सभी अध्याय एक ही जगह

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  विष्णु पुराण सम्पूर्ण कथा – (Vishnu Puran Katha in Hindi) सभी अध्याय एक ही जगह  विष्णु पुराण (Vishnu Puran)   -- 18 puran में विष्णु पुराण (Vishnu Puran Hindi) का आकार सबसे छोटा है, विष्णु पुराण (Vishnu Puran Ki Katha) में भगवान विष्णु के चरित्र का विस्तृत वर्णन है। विष्णु पुराण (Vishnu Puran Katha) के रचियता ब्यास जी के पिता पराशर जी हैं। विष्णु पुराण (Vishnu Puran in Hindi) में वर्णन आता है कि जब पाराशर के पिता शक्ति को राक्षसों ने मार डाला तब क्रोध में आकर पाराशर मुनि ने राक्षसों के विनाश के लिये ‘‘रक्षोघ्न यज्ञ’’ प्रारम्भ किया। उसमें हजारों राक्षस गिर-गिर कर स्वाहा होने लगे। इस पर राक्षसों के पिता पुलस्त्य ऋषि और पाराशर के पितामह वशिष्ठ जी ने पाराशर को समझाया और वह यज्ञ बन्द किया। इससे पुलस्त्य ऋषि बड़े प्रसन्न हुये औरा पाराशर जी को विष्णु पुराण के रचियता होने का आर्शीवाद दिया। विष्णु पुराण (Vishnu Puran)   -- 18 puran में विष्णु पुराण (Vishnu Puran Hindi) का आकार सबसे छोटा है, विष्णु पुराण (Vishnu Puran Ki Katha) में भगवान विष्णु के चरित्र का विस्तृत...

हृदय में सीताराम (रामायण की कहानी) | Hriday me Sita Ram Ramayan Ki Kahani

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 हृदय में सीताराम (रामायण की कहानी) | Hriday me Sita Ram Ramayan Ki Kahani यह प्रसंग उस समय का है, जब श्री राम भगवान लंका पर विजय प्राप्त कर के और 14 वर्ष का वनवास पूरा करके अयोध्या लौटे थे। उस समय पूरी अयोध्या बहुत ही खुश थी और हर्षोल्लास से भरी हुई थी। इसके तत्पश्चात श्री राम भगवान को राज सिंहासन मिलने जा रहा था, उनका राज तिलक समारोह चल रहा था, जिसके बीच में श्री राम भगवान ने अपनी मोतियों की माला हनुमान जी को दे दी। जैसे ही हनुमान जी ने वह माला प्राप्त की, उन्होंने वह तोड़ दी और उसके एक एक मोती को बड़े ध्यान से देखने लगे, सब इस बात को देखकर हैरान रह गए और सीता माता ने पूछा हनुमान इस माला को तोड़ने का क्या तात्पर्य है, यह तो तुम्हारे प्रभु श्री राम भगवान ने दी है। इस पर हनुमान जी ने जवाब दिया कि हे माता जिस चीज में श्री राम का नाम नहीं वह मेरे लिए बेकार है, इसीलिए यह मोतियों की माला मेरे किसी काम की नहीं। इसके पश्चात सीता जी ने श्री राम भगवान से यह प्रश्न किया कि हनुमान के हृदय में कौन विराज मान है, तत्पश्चात हनुमान जी ने अपना हृदय चीर कर दिखाया, वहां पर राम सीता की जोड़ी विराजमान...

विराध और राम की कहानी

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  विराध और राम की कहानी राम जब सीता और लक्ष्मण के साथ दंडकारण्य में थे तभी उनका सामना मनुष्य भक्षि देत्ये विराध से हुआ। दैत्य ने सीता को उठा लिया और उन्हें ले जाने लगा राम ने अपना धनुष निकाल लिया। विराध उनके छोटे से धनुष को देखकर हंसने लगा और उसने पल भर में उनके धनुष को अपनी उंगली से तोड़ डाला।  राम समझ गए कि विराट के सामने धनुष का इस्तेमाल करना बेकार है। राम और लक्ष्मण ने उसके हाथ अलग कर देने का निश्चय किया। दोनों ने पूरी शक्ति से उसके हाथ खींच दिए, और उसे नीचे पटक दिया। राम ने फुर्ती से विराध के ऊपर अपना पैर रख दिया उनके ऐसा करते ही चमत्कार हो गया। विराट की आंखों से विनम्रता झलकने लगी। अपने हाथ जोड़कर वह कहने लगा, “आपके चरणों ने मेरे मन को शुद्ध कर दिया है। मैं देत्ये नहीं गंधर्व हुँ,कृपया मुझे मार डालिए और मुझे श्राप मुक्त कर दीजिए।”

शूर्पणखा की कहानी

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 शूर्पणखा की कहानी राम लक्ष्मण और सीता को वन में रहते कई साल हो गए थे। ऋषि-मुनियों से वेट करते-करते और असुरों से लड़ते हुए दिन बीत रहे थे। अंततः वे पंचवटी पहुंचे। उन्होंने वहां एक कुटिया बनाई और रहने लगे। 1 दिन रावण की बहन शूर्पणखा वहां पर आई। उसकी निगाह कुटिया के बाहर खड़े सुंदर राम पर पड़ी। राम से उसे तुरंत प्रेम हो गया। शूर्पणखा बहुत कुरूप थी। राम को आकर्षित करने के लिए उसने अपने आपको एक सुंदरी के रूप में बदल लिया। उसने राम के विवाह की इच्छा जताई। राम ने यह कहते हुए मना कर दिया कि वह तो पहले से विवाहित है।  तभी शूर्पणखा की निगाह लक्ष्मण पर पड़ी। लक्ष्मण को देखकर उसकी भावनाएं फिर से जागृत हो गई। उसने लक्ष्मण के सामने भी विवाह का प्रस्ताव रखा। लक्ष्मण ने भी अस्वीकार कर दिया। शूर्पणखा यह अपमान नहीं सह सके। उसने सीता पर आक्रमण कर दिया। लक्ष्मण को क्रोध आ गया। उसने तलवार से शूर्पणखा के नाक काट दिए।

रावण और मंदोदरी के विवाह की कथा

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  रावण और मंदोदरी के विवाह की कथा पौराणिक कथा के अनुसार मधुरा नाम की एक अप्सरा भगवान भोलेनाथ की तलाश में कैलाश पर्वत पर पहुंच गई. वहां पहुंचकर उसने पाया कि भगवान शिव के पास पार्वती नहीं हैं. इसका उसने फायदा उठाने की कोशिश शुरू कर दी. वह भोलेनाथ को मोहित करने का प्रयास करने लगी. लेकिन कुछ समय बाद ही वहां माता पार्वती पहुंच जाती हैं. उन्हें मधुरा के शरीर पर भगवान शिव की भस्म देखकर क्रोध आ जाता है, और माता पार्वती मधुरा को 12 साल तक मेंढक बनी रहने, और कुंए में ही जीवन व्यतीत करने का शाप देती हैं. शाप के कारण मधुरा को असह्य कष्ट सहने पड़े. उसका जीवन संकटों से घिर गया. लेकिन जिस समय ये सारी घटनाएं घट रही थी, उसी समय कैलाश पर असुर राजा मायासुर अपनी पत्नी के साथ तपस्या कर रहे थे. ये एक बेटी की कामना के लिए तपस्या कर रहे थे. 12 वर्षों तक दोनों तप करते रहे. इधर मधुरा के शाप का जब अंत हुआ तो वो कुंए में ही रोने लगी. सौभाग्य से असुरराज और उनकी पत्नी दोनों कुंए के पास ही तपस्या कर रहे थे. उन्होंने रोने की आवाज सुनी तो कुंए के पास पहुंचे. वहां उन्हें मधुरा दिखी, जिसने पूरी कहानी सुनाई. असुरराज न...

बाबा रामदेव जी की जन्मकथा (Baba Ramdev KI Khata)

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  बाबा रामदेव जी की जन्मकथा (Baba Ramdev KI Khata) राजा अजमल जी द्वारिका‍नाथ के परमभक्त होते हुए भी उनको दु:ख था उनके कोई पुत्र नहीं था। दूसरा दु:ख था कि उनके ही राज्य में पड़ने वाले पोकरण से 3 मील उत्तर दिशा में भैरव राक्षस ने परेशान कर रखा था। राजा अजमल जी पुत्र प्राप्ति के लिये दान पुण्य करते, साधू सन्तों को भोजन कराते, यज्ञ कराते, नित्य ही द्वारिका‍नाथ की पूजा करते थे। भैरव राक्षस को मारने का उपाय सोचते हुए राजा अजमल जी द्वारका जी पहुंचे। जहां अजमल जी को भगवान के साक्षात दर्शन हुए, राजा के आखों में आंसू देखकर भगवान में अपने पिताम्बर से आंसू पोछकर कहा, हे भक्तराज रो मत मैं तुम्हारा सारा दु:ख जानता हूँ। मैं तेरी भक्ति देखकर बहुत प्रसन्न हूँ। भगवान की असीम कृपा प्राप्त कर राजा अजमल जी बोले हे प्रभु अगर आप मेरी भक्ति से प्रसन्न हैं तो मुझे आपके समान पुत्र चाहिये, आपको मेरे घर पुत्र बनकर आना पड़ेगा और राक्षस को मारकर धर्म की स्थापना करनी पड़ेगी।भगवान श्रीकृष्ण ने इस पर उन्हें आश्वस्त किया कि वे स्वयं उनके घर अवतार लेंगे। बाबा रामदेव के रूप में जन्मे श्रीकृष्ण संवत् 1409 में भाद्र मा...

Sunday Vrat Katha

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रविवार व्रत की पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक बुढ़िया रहती थी। वह नियमित रूप से रविवार का व्रत करती। रविवार के दिन सूर्योदय से पहले उठकर बुढ़िया स्नानादि से निवृत्त होकर आंगन को गोबर से लीपकर स्वच्छ करती, उसके बाद सूर्य भगवान की पूजा करते हुए रविवार व्रत कथा सुनकर सूर्य भगवान का भोग लगाकर दिन में एक समय भोजन करती। सूर्य भगवान की अनुकंपा से बुढ़िया को किसी प्रकार की चिंता एवं कष्ट नहीं था। धीरे-धीरे उसका घर धन-धान्य से भर रहा था।  उस बुढ़िया को सुखी होते देख उसकी पड़ोसन उससे जलने लगी। बुढ़िया ने कोई गाय नहीं पाल रखी थी। अतः वह अपनी पड़ोसन के आंगन में बंधी गाय का गोबर लाती थी। पड़ोसन ने कुछ सोचकर अपनी गाय को घर के भीतर बांध दिया। रविवार को गोबर न मिलने से बुढ़िया अपना आंगन नहीं लीप सकी। आंगन न लीप पाने के कारण उस बुढ़िया ने सूर्य भगवान को भोग नहीं लगाया और उस दिन स्वयं भी भोजन नहीं किया। सूर्यास्त होने पर बुढ़िया भूखी-प्यासी सो गई।   प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उस बुढ़िया की आंख खुली तो वह अपने घर के आंगन में सुंदर गाय और बछड़े को देखकर हैरान हो गई। गाय को आंगन में...

शनिवार व्रत कथा (Shanivar Vrat Katha)

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शनिवार व्रत कथा (Shanivar Vrat Katha) आज शनिवार का दिन शनि देव (Shani Dev) की पूजा के लिए है. इस दिन शनि देव की पूजा करने से वे प्रसन्न होते हैं और भक्तों के कष्ट दूर करते हैं. जिनकी कुंडली में शनि दोष (Shani Dosh), शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या होती है, उनको शनिवार का व्रत करना चाहिए और शनिवार व्रत कथा पढ़नी चाहिए. शनि देव के इस कथा (Shani Dev Katha) का श्रवण करने से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और शनि देव की कृपा प्राप्त होती है.                                                                      शनिवार व्रत कथा एक समय की बात है. सभी ग्रहों में सर्वश्रेष्ठ होने को लेकर विवाद हो गया. वे सभी ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु इंद्र देव के पास गए. वे भी निर्णय करने में असमर्थ थे, तो उन्होंने सभी ग्रहों को पृथ्वी पर राजा विक्रमादित्य के पास भेज दिया क्योंकि वे एक न्यायप्रिय राजा थे. सभी ग्रह राजा ...

बुद्धवार व्रत कथा और पूजन विधि – Budhwar Vrat Katha

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 बुद्धवार व्रत कथा  एक समय एक व्यक्ति अपनी पत्नी को विदा करवाने के लिये अपनी ससुराल गया. वहां पर कुछ दिन रहने के पश्चात् सास-ससुर से विदा करने के लिये कहा. किन्तु सबने कहा कि आज बुद्धवार का दिन है आज के दिन गमन नहीं करते हैं. वह व्यक्ति किसी प्रकार न माना और हठधर्मी करके बुद्धवार के दिन ही पत्नी को विदा कराकर अपने नगर को चल पड़ा. राह में उसकी पत्नी को प्यास लगी तो उसने अपने पति से कहा कि मुझे बहुत जोर से प्यास लगी है. तब वह व्यक्ति लोटा लेकर रथ से उतरकर जल लेने चला गया. जैसे ही वह व्यक्ति पानी लेकर अपनी पत्नी के निकट आया तो वह यह देखकर आश्चर्य से चकित रह गया कि ठीक अपनी ही जैसी सूरत तथा वैसी ही वेश-भूषा में वह व्यक्ति उसकी पत्नी के साथ रथ में बैठा हुआ है. उसने क्रोध से कहा कि तू कौन है जो मेरी पत्नी के निकट बैठा हुआ है.  दूसरा व्यक्ति बोला कि यह मेरी पत्नी है. इसे मैं अभी-अभी ससुराल से विदा कराकर ला रहा हूं. वे दोनों व्यक्ति परस्पर झगड़ने लगे. तभी राज्य के सिपाही आकर लोटे वाले व्यक्ति को पकड़ने लगे. स्त्री से पूछा, तुम्हारा असली पति कौन सा है.  तब पत्नी शांत ही रही क...

मंगलवार व्रत कथा (Mangalwar Vrat Katha)

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 मंगलवार व्रत कथा एक समय की बात है एक ब्राह्मण दंपत्ति की कोई संतान नहीं थी, जिस कारण वह बेहद दुःखी थे। एक समय ब्राह्मण वन में हनुमान जी की पूजा के लिए गया। वहाँ उसने पूजा के साथ महावीर जी से एक पुत्र की कामना की। घर पर उसकी स्त्री भी पुत्र की प्राप्ति के लिए मंगलवार का व्रत करती थी। वह मंगलवार के दिन व्रत के अंत में हनुमान जी को भोग लगाकर ही भोजन करती थी। एक बार व्रत के दिन ब्राह्मणी ना भोजन बना पाई और ना ही हनुमान जी को भोग लगा सकी। उसने प्रण किया कि वह अगले मंगलवार को हनुमान जी को भोग लगाकर ही भोजन करेगी। वह भूखी प्यासी छह दिन तक पड़ी रही। मंगलवार के दिन वह बेहोश हो गई। हनुमान जी उसकी निष्ठा और लगन को देखकर प्रसन्न हुए। उन्होंने आशीर्वाद स्वरूप ब्राह्मणी को एक पुत्र दिया और कहा कि यह तुम्हारी बहुत सेवा करेगा। बालक को पाकर ब्राह्मणी अति प्रसन्न हुई। उसने बालक का नाम मंगल रखा। कुछ समय उपरांत जब ब्राह्मण घर आया, तो बालक को देख पूछा कि वह कौन है? पत्नी बोली कि मंगलवार व्रत से प्रसन्न होकर हनुमान जी ने उसे यह बालक दिया है। ब्राह्मण को अपनी पत्नी की बात पर विश्वास नहीं हुआ। एक दिन मौका...

सोमवार व्रत कथा (श‍िव-पार्वती की कृपा)

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 सोमवार व्रत कथा (श‍िव-पार्वती की कृपा) बाबा भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए आप भी सोमवार का व्रत कर रहे हैं, तो शिव व्रत कथा को पढ़कर या सुनकर इस उपवास को पूर्ण करें. सोमवार व्रत की विधि: नारद पुराण के अनुसार सोमवार व्रत में व्यक्ति को प्रातः स्नान करके शिव जी को जल और बेल पत्र चढ़ाना चाहिए तथा शिव-गौरी की पूजा करनी चाहिए .शिव पूजन के बाद सोमवार व्रत कथा सुननी चाहिए. इसके बाद केवल एक समय ही भोजन करना चाहिए. साधारण रूप से सोमवार का व्रत दिन के तीसरे पहर तक होता है.मतलब शाम तक रखा जाता है. सोमवार व्रत तीन प्रकार का होता है प्रति सोमवार व्रत, सौम्य प्रदोष व्रत और सोलह सोमवार का व्रत.इन सभी व्रतों के लिए एक ही विधि होती है | व्रत कथा: एक बार की बात है एक शहर में एक साहूकार रहता था। उनके घर में पैसों की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी, जिससे वे बहुत दुखी रहते थे। पुत्र प्राप्ति के लिए वे प्रत्येक सोमवार का व्रत (Somwar vrat) रखते थे और शिव मंदिर में जाकर पूरी श्रद्धा से भगवान शिव और पार्वती जी की पूजा करते थे। उनकी भक्ति देखकर एक दिन माता पार्वती प्रसन्न हुई और उन्होंने भग...

श्री कृष्ण भक्त संत श्री सूरदास जी की जीवनी

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श्री कृष्ण भक्त संत श्री सूरदास जी की जीवनी  श्री सूरदास जी का परिचय   श्री सूरदास जी पूर्ण भगवत्भक्त, अलौकिक कवी, महात्यागी, अनुपम वैरागी और परम प्रेमी भक्त थे, महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य के शब्दों में वे 'भक्ति के सागर' थे और श्री गोसाईं श्री विट्ठलनाथ जी के शब्दों में वे 'पुष्टिमार्ग के जहाज' थे। उनके द्वारा रचा गया सूरसागर ग्रन्थ काव्यामृत का असीम सागर है, जिसमें उन्होंने सवा लाख से अधिक पदों की रचना की थी। भगवान की लीलाओं का गायन ही उनकी अपार, अचल और अक्षुण संपत्ति थी।  श्री सूरदास जी का जन्म दिल्ली से कुछ दुरी पर सीही गांव में एक निर्धन ब्राह्मण के घर विक्रम संवत 1535 में वैशाख शुक्ल पंचमी के दिन हुआ था। बालक के जन्म के अवसर पर ऐसा  प्रतीत हुआ मानो धरती पर एक दिव्य ज्योति बालक सूरदास के रूप में उतरी, जिससे चारों और शुभ प्रकाश फ़ैल गया। ऐसा लगता था जैसे भगवती गंगा ने कलिकाल के प्रभाव को कम करने के लिए कायाकल्प किया है, शिशु के माता-पिता और समस्त गांव वाले आश्चर्यचकित रह गए।  जन्म के समय से ही श्री सूरदास जी के नेत्र बंद थे, वे देख नहीं सकते थे, जिसके कारण उनक...

परशुराम

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परशुराम राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका और भृगुवंशीय जमदग्नि के पुत्र, विष्णु के अवतार और शिव के परम भक्त थे। इन्हें शिव से विशेष 'परशु' प्राप्त हुआ था। इनका नाम तो राम था, किन्तु शंकर द्वारा प्रदत्त अमोघ परशु को सदैव धारण किये रहने के कारण ये 'परशुराम' कहलाते थे। ये भगवान विष्णु के दस अवतारों में से छठे अवतार कहे जाते हैं, जो वामन एवं रामचन्द्र के मध्य में गिना जाता है। जमदग्नि के पुत्र होने के कारण ये 'जामदग्न्य' भी कहे जाते हैं। इनका जन्म अक्षय तृतीया, (वैशाख शुक्ल तृतीया) को हुआ था। अत: इस दिन व्रत करने और उत्सव मनाने की प्रथा है। परम्परा के अनुसार इन्होंने क्षत्रियों का अनेक बार विनाश किया। क्षत्रियों के अहंकारपूर्ण दमन से विश्व को मुक्ति दिलाने के लिए इनका जन्म हुआ था। जन्म कथा प्राचीन काल में कन्नौज में गाधि नाम के एक राजा राज्य करते थे। उनकी सत्यवती नाम की एक अत्यन्त रूपवती कन्या थी। राजा गाधि ने सत्यवती का विवाह भृगुनन्दन ऋषीक के साथ कर दिया था। भृगु ने जब अपने पुत्र के विवाह के विषय में जाना तो बहुत प्रसन्न हुए तथा अपनी पुत्...

संत श्री रैदास (रविदास) जी की जीवनी (Sant Raidas Ki Jivni)

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संत श्री रैदास (रविदास) जी की जीवनी   संत रैदास भक्तिकाल के अग्रणी संतों में से एक थे, वे संत श्री रामानंदजी के शिष्य थे। संत रैदास जी को संत रविदास के नाम से भी जाना जाता है, वे संत श्री गोस्वामी तुलसीदास जी और संत श्री गोरखनाथ जी के समकालीन संत थे। उन्होंने परम कृष्ण भक्त मीराबाई को भी दीक्षा दी थी। इन्होने अपने जीवन में कई बार भगवान के साक्षात दर्शन प्राप्त किए, इनकी महिमा को देखकर भारत के कई राजा और रानियाँ इनकी शरण में आकर भक्ति मार्ग से जुड़े, इन्होने अपने समय में समाज में फैली कुरीतियों और भेदभाव को दूर करने का प्रयास किया। संत रैदास (रविदास) जी का प्रारंभिक जीवन संत रैदास का जन्म सन 1450 को काशी नगरी में हुआ था, इसके पिता का नाम रग्घू तथा माता का नाम घुरबीनिया था, ये जाती से चर्मकार थे तथा जूते बनाने का काम किया करते थे। रैदास जी की बचपन से ही भगवान की भक्ति और साधु सेवा में विशेष रूचि हो गयी थी। थोड़ा बड़ा होने पर इन्होने भी अपने पिता का व्यवसाय अपना लिया और जूते बनाने का काम करने लगे, कुछ समय बाद इनका विवाह भी कर दिया गया, इनकी पत्नी का नाम लोना देवी था। स्वभाव से संत र...

श्री कृष्ण भक्त कर्माबाई की कहानी (Shree Krishna Bhakt Karma Bai Ki Kahani)

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श्री कृष्ण भक्त कर्माबाई की कहानी राजस्थान के नागौर जिले के ग्राम कालवा में एक जाट किसान जीवनराम डूडी के घर 1615 में एक कन्या का जन्म हुआ। कन्या का जन्म होने पर पिता जीवनराम डूडी को अत्यंत ख़ुशी हुई, उन्होंने उस कन्या का नाम कर्मा रखा। कर्मा को सभी कर्माबाई भी बुलाते थे।  जीवनराम डूडी स्वयं एक कृष्णा भक्त थे, अपने घर में उन्होंने कृष्ण भगवन का मदनमोहन के नाम से मंदिर बना रखा था जहाँ वे रोज भगवन कृष्ण की पूजा करते भगवन को भोग लगते तथा भगवान् को भोग लगाने के बाद ही वे भोजन ग्रहण करते, यह उनके घर का नित्य का नियम था। इसी प्रकार समय बीतता गया, कर्माबाई रोज अपने पिता को कृष्णा भगवान की पूजा करते देखती उनको भोग लगते देखती और भगवान् को भोग लगाने के बाद ही वे भोजन ग्रहण करते, यही सब देखते सीखते कर्माबाई का बचपन बीत रहा था। कुछ वर्षो के बाद कर्माबाई के पिता कुछ दिनों के लिए तीर्थयात्रा पर चले गए, तीर्थयात्रा पर जाने से पहले पिता जीवनराम डूडी ने कर्माबाई को भगवान् की पूजा विधि समझाई और कहा की भगवन को भोग लगाकर ही भोजन ग्रहण करना और घर का ध्यान रखना, इस प्रकार भगवान् की पूजा और घर की देखरेख का...

बुद्ध पूर्णिमा

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बुद्ध पूर्णिमा हिंदू धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भगवान बुद्ध को श्री विष्णु के 9वें अवतार हैं, इसलिए हिंदू धर्म के लोगों के लिए भी बुद्ध पूर्णिमा का विशेष महत्व होता है बुद्ध जयंती 23 मई को मनाई जा रही है. दुनिया भर के बौद्ध और हिंदू भगवान गौतम बुद्ध के जन्म को बुद्ध जयंती के रूप में मनाते हैं. भगवान बुद्ध का जन्म सिद्धार्थ गौतम नाम के एक राजकुमार के रूप में पूर्णिमा तिथि पर 563 ईसा पहले पूर्णिमा के दिन लुंबिनी में हुआ था. इसलिए उनकी जयंती के दिन को बुद्ध पूर्णिमा या बैसाखी बुद्ध पूर्णिमा के रूप में मनाते हैं. श्रीलंका, म्यांमार, कंबोडिया, जावा, इंडोनेशिया, तिब्बत, मंगोलिया ये सब देश बुद्ध जयंती के विशेष दिन को एक बड़े उत्सव के रूप में मनाते हैं. दरअसल बुद्ध जयंती की तारीख एशियाई चन्द्र सौर कैलेंडर पर आधारित है, इसलिए हर इसकी तारीख में बदलाव होता है. इस बार बुद्ध पूर्णिमा 25 मई की रात 08.29 बजे शुरू हुई और 26 मई शाम 04.43 बजे समाप्त होगी. भगवान गौतम बुद्ध एकमात्र ऐसे थे जिन्होंने जन्म और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति पाई थी. वो एक दार्शनिक, आध्यात्मिक मार्गदर्शक और धार्मिक ...