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बृहस्पतिदेव की कथा (Shri Brihaspatidev Ji Vrat Katha)

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बृहस्पतिदेव की कथा (Shri Brihaspatidev Ji Vrat Katha) भारतवर्ष में एक प्रतापी और दानी राजा राज्य करता था। वह नित्य गरीबों और ब्राह्मणों की सहायता करता था। यह बात उसकी रानी को अच्छी नहीं लगती थी, वह न ही गरीबों को दान देती, न ही भगवान का पूजन करती थी और राजा को भी दान देने से मना किया करती थी। एक दिन राजा शिकार खेलने वन को गए हुए थे, तो रानी महल में अकेली थी। उसी समय बृहस्पतिदेव साधु वेष में राजा के महल में भिक्षा के लिए गए और भिक्षा माँगी रानी ने भिक्षा देने से इन्कार किया और कहा: हे साधु महाराज मैं तो दान पुण्य से तंग आ गई हूँ। मेरा पति सारा धन लुटाते रहिते हैं। मेरी इच्छा है कि हमारा धन नष्ट हो जाए फिर न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। साधु ने कहा: देवी तुम तो बड़ी विचित्र हो। धन, सन्तान तो सभी चाहते हैं। पुत्र और लक्ष्मी तो पापी के घर भी होने चाहिए। यदि तुम्हारे पास अधिक धन है तो भूखों को भोजन दो, प्यासों के लिए प्याऊ बनवाओ, मुसाफिरों के लिए धर्मशालाएं खुलवाओ। जो निर्धन अपनी कुंवारी कन्याओं का विवाह नहीं कर सकते उनका विवाह करा दो। ऐसे और कई काम हैं जिनके करने से तुम्हारा यश लोक-परलोक मे...

प्रेम मंदिर

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                                        प्रेम मंदिर प्रेम मंदिर भारत में उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा जिले के समीप वृंदावन में स्थित है।  इसका निर्माण जगद्गुरु कृपालु महाराज द्वारा भगवान कृष्ण और राधा के मन्दिर के रूप में करवाया गया है । मन्दिर का लोकार्पण १७ फरवरी को किया गया था। इस मन्दिर के निर्माण में ११ वर्ष का समय और लगभग १०० करोड़ रुपए की धन राशि लगी है। Video- 

विष्णु पुराण सम्पूर्ण कथा – (Vishnu Puran Katha in Hindi) सभी अध्याय एक ही जगह

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  विष्णु पुराण सम्पूर्ण कथा – (Vishnu Puran Katha in Hindi) सभी अध्याय एक ही जगह  विष्णु पुराण (Vishnu Puran)   -- 18 puran में विष्णु पुराण (Vishnu Puran Hindi) का आकार सबसे छोटा है, विष्णु पुराण (Vishnu Puran Ki Katha) में भगवान विष्णु के चरित्र का विस्तृत वर्णन है। विष्णु पुराण (Vishnu Puran Katha) के रचियता ब्यास जी के पिता पराशर जी हैं। विष्णु पुराण (Vishnu Puran in Hindi) में वर्णन आता है कि जब पाराशर के पिता शक्ति को राक्षसों ने मार डाला तब क्रोध में आकर पाराशर मुनि ने राक्षसों के विनाश के लिये ‘‘रक्षोघ्न यज्ञ’’ प्रारम्भ किया। उसमें हजारों राक्षस गिर-गिर कर स्वाहा होने लगे। इस पर राक्षसों के पिता पुलस्त्य ऋषि और पाराशर के पितामह वशिष्ठ जी ने पाराशर को समझाया और वह यज्ञ बन्द किया। इससे पुलस्त्य ऋषि बड़े प्रसन्न हुये औरा पाराशर जी को विष्णु पुराण के रचियता होने का आर्शीवाद दिया। विष्णु पुराण (Vishnu Puran)   -- 18 puran में विष्णु पुराण (Vishnu Puran Hindi) का आकार सबसे छोटा है, विष्णु पुराण (Vishnu Puran Ki Katha) में भगवान विष्णु के चरित्र का विस्तृत...

हृदय में सीताराम (रामायण की कहानी) | Hriday me Sita Ram Ramayan Ki Kahani

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 हृदय में सीताराम (रामायण की कहानी) | Hriday me Sita Ram Ramayan Ki Kahani यह प्रसंग उस समय का है, जब श्री राम भगवान लंका पर विजय प्राप्त कर के और 14 वर्ष का वनवास पूरा करके अयोध्या लौटे थे। उस समय पूरी अयोध्या बहुत ही खुश थी और हर्षोल्लास से भरी हुई थी। इसके तत्पश्चात श्री राम भगवान को राज सिंहासन मिलने जा रहा था, उनका राज तिलक समारोह चल रहा था, जिसके बीच में श्री राम भगवान ने अपनी मोतियों की माला हनुमान जी को दे दी। जैसे ही हनुमान जी ने वह माला प्राप्त की, उन्होंने वह तोड़ दी और उसके एक एक मोती को बड़े ध्यान से देखने लगे, सब इस बात को देखकर हैरान रह गए और सीता माता ने पूछा हनुमान इस माला को तोड़ने का क्या तात्पर्य है, यह तो तुम्हारे प्रभु श्री राम भगवान ने दी है। इस पर हनुमान जी ने जवाब दिया कि हे माता जिस चीज में श्री राम का नाम नहीं वह मेरे लिए बेकार है, इसीलिए यह मोतियों की माला मेरे किसी काम की नहीं। इसके पश्चात सीता जी ने श्री राम भगवान से यह प्रश्न किया कि हनुमान के हृदय में कौन विराज मान है, तत्पश्चात हनुमान जी ने अपना हृदय चीर कर दिखाया, वहां पर राम सीता की जोड़ी विराजमान...

विराध और राम की कहानी

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  विराध और राम की कहानी राम जब सीता और लक्ष्मण के साथ दंडकारण्य में थे तभी उनका सामना मनुष्य भक्षि देत्ये विराध से हुआ। दैत्य ने सीता को उठा लिया और उन्हें ले जाने लगा राम ने अपना धनुष निकाल लिया। विराध उनके छोटे से धनुष को देखकर हंसने लगा और उसने पल भर में उनके धनुष को अपनी उंगली से तोड़ डाला।  राम समझ गए कि विराट के सामने धनुष का इस्तेमाल करना बेकार है। राम और लक्ष्मण ने उसके हाथ अलग कर देने का निश्चय किया। दोनों ने पूरी शक्ति से उसके हाथ खींच दिए, और उसे नीचे पटक दिया। राम ने फुर्ती से विराध के ऊपर अपना पैर रख दिया उनके ऐसा करते ही चमत्कार हो गया। विराट की आंखों से विनम्रता झलकने लगी। अपने हाथ जोड़कर वह कहने लगा, “आपके चरणों ने मेरे मन को शुद्ध कर दिया है। मैं देत्ये नहीं गंधर्व हुँ,कृपया मुझे मार डालिए और मुझे श्राप मुक्त कर दीजिए।”

शूर्पणखा की कहानी

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 शूर्पणखा की कहानी राम लक्ष्मण और सीता को वन में रहते कई साल हो गए थे। ऋषि-मुनियों से वेट करते-करते और असुरों से लड़ते हुए दिन बीत रहे थे। अंततः वे पंचवटी पहुंचे। उन्होंने वहां एक कुटिया बनाई और रहने लगे। 1 दिन रावण की बहन शूर्पणखा वहां पर आई। उसकी निगाह कुटिया के बाहर खड़े सुंदर राम पर पड़ी। राम से उसे तुरंत प्रेम हो गया। शूर्पणखा बहुत कुरूप थी। राम को आकर्षित करने के लिए उसने अपने आपको एक सुंदरी के रूप में बदल लिया। उसने राम के विवाह की इच्छा जताई। राम ने यह कहते हुए मना कर दिया कि वह तो पहले से विवाहित है।  तभी शूर्पणखा की निगाह लक्ष्मण पर पड़ी। लक्ष्मण को देखकर उसकी भावनाएं फिर से जागृत हो गई। उसने लक्ष्मण के सामने भी विवाह का प्रस्ताव रखा। लक्ष्मण ने भी अस्वीकार कर दिया। शूर्पणखा यह अपमान नहीं सह सके। उसने सीता पर आक्रमण कर दिया। लक्ष्मण को क्रोध आ गया। उसने तलवार से शूर्पणखा के नाक काट दिए।

रावण और मंदोदरी के विवाह की कथा

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  रावण और मंदोदरी के विवाह की कथा पौराणिक कथा के अनुसार मधुरा नाम की एक अप्सरा भगवान भोलेनाथ की तलाश में कैलाश पर्वत पर पहुंच गई. वहां पहुंचकर उसने पाया कि भगवान शिव के पास पार्वती नहीं हैं. इसका उसने फायदा उठाने की कोशिश शुरू कर दी. वह भोलेनाथ को मोहित करने का प्रयास करने लगी. लेकिन कुछ समय बाद ही वहां माता पार्वती पहुंच जाती हैं. उन्हें मधुरा के शरीर पर भगवान शिव की भस्म देखकर क्रोध आ जाता है, और माता पार्वती मधुरा को 12 साल तक मेंढक बनी रहने, और कुंए में ही जीवन व्यतीत करने का शाप देती हैं. शाप के कारण मधुरा को असह्य कष्ट सहने पड़े. उसका जीवन संकटों से घिर गया. लेकिन जिस समय ये सारी घटनाएं घट रही थी, उसी समय कैलाश पर असुर राजा मायासुर अपनी पत्नी के साथ तपस्या कर रहे थे. ये एक बेटी की कामना के लिए तपस्या कर रहे थे. 12 वर्षों तक दोनों तप करते रहे. इधर मधुरा के शाप का जब अंत हुआ तो वो कुंए में ही रोने लगी. सौभाग्य से असुरराज और उनकी पत्नी दोनों कुंए के पास ही तपस्या कर रहे थे. उन्होंने रोने की आवाज सुनी तो कुंए के पास पहुंचे. वहां उन्हें मधुरा दिखी, जिसने पूरी कहानी सुनाई. असुरराज न...