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ध्रुव की कथा

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ध्रुव की कथा राजा उतानपात को अपनी पत्नी सुनीति से विवाह के कई वर्षों पश्चात् तक कोई संतान प्राप्त नहीं हुई। एक दिन नारद जी ने रानी सुनीति से बताया कि राजा का दूसरा विवाह होगा तो आपको भी संतान प्राप्त होगी और उस नई पत्नी को भी संतान प्राप्त होगी।राजा का वृद्ध अवस्था में दूसरा विवाह हुआ। छोटी पत्नी ने नगर की सीमा पर आकर राजा से वचनबद्ध होकर अपनी शर्त मानने पर विवश किया कि मैं तेरे घर तब चलूंगी, जब तू मेरी बहन को जो आपकी पत्नी है, जाते ही घर से निकालकर दूसरे मकान में रखेगा। उसको सवा सेर अन्न खाने को प्रतिदिन देगा तथा मेरे गर्भ से उत्पन्न पुत्रा को राज्य देगा। सुनिती ही अपने माता-पिता के पास से जिद करके अपनी छोटी बहन सुरिती को माँगकर लाई थी। सुरिती को दुःख था कि इसने मेरे जीवन से खिलवाड़ किया है कि एक वृद्ध से मेरा विवाह कराया है। राजा ने विवश होकर यह शर्त मान ली। कुछ वर्ष पश्चात् बड़ी रानी सुनिती ने एक लड़के को जन्म दिया। उसका नाम ध्रुव रखा। बाद में छोटी रानी सुरिती को लड़का हुआ। उसका नाम उत्तम रखा। जब ध्रुव की आयु 5 वर्ष तथा उत्तम की 4 वर्ष की हुई तो उत्तम का जन्मदिन भी कुछ म...

धन्ना भक्त की कथा

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धन्ना भक्त की कथा राजस्थान प्रान्त में एक जाट जाति में धन्ना नामक भक्त था। गाँव में बारिश हुई। सब गाँव वाले ज्वार का बीज लेकर अपने-अपने खेतों में बोने के लिए चले। भक्त धन्ना जाट भी ज्वार का बीज लेकर खेत में बोने चला। रास्ते में चार साधु आ रहे थे। भक्त ने साधुओं को देखकर बैल रोक लिए। खड़ा हो गया। राम-राम की, साधुओं के चरण छूए।  साधुओं ने बताया कि भक्त! दो दिन से कुछ खाने को नहीं मिला है। प्राण जाने वाले हैं। धन्ना भक्त ने कहा कि यह बीज की ज्वार है। आप इसे खाकर अपनी भूख शांत करो। भूखे साधु उस ज्वार के बीज पर ही लिपट गए। सब ज्वार खा गए। भक्त का धन्यवाद किया और चले गए। धन्ना भक्त की पत्नी गर्म स्वभाव की थी। भक्त ने विचार किया कि पत्नी को पता चलेगा तो झगड़ा करेगी। इसलिए कंकर इकट्ठी करके थैले में डाल ली जिसमें ज्वार डाल रखी थी। भक्त ने ज्वार के स्थान पर कंकर बीज दी। लग रहा था कि जैसे ज्वार बीज रहा हो। धन्ना जी भी सब किसानों के साथ घर आ गया। दो महीने के पश्चात् सब किसानों के खेतों में ज्वार उगी और धन्ना जी के खेत में तूम्बे की बेल अत्यधिक मात्रा में उगी और मोटे-मोटे तूम्बे लगे। ...

दुष्यन्त पुत्र भरत की कहानी

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  दुष्यन्त पुत्र भरत की कहानी भरत हस्तिनापुर के राजा दुष्यन्त के पुत्र थे. राजा दुष्यन्त एक बार शिकार खेलते हुए कण्व ऋषि के आश्रम पहुंचे, वहां शकुन्तला को देखकर वह उस पर मोहित हो गये और शकुन्तला से आश्रम में ही गंधर्व विवाह कर लिया. आश्रम में ऋषि कण्व के न होने के कारण राजा दुष्यन्त शकुन्तला को अपने साथ नहीं ले जा सके. उन्होंने शकुन्तला को एक अँगूठी दे दी जो उनके विवाह की निशानी थी. दुष्यंत और शकुंतला की कथा एक दिन शकुन्तला अपनी सहेलियों के साथ बैठी दुष्यन्त के बारे में सोच रही थी. उसी समय दुर्वासा ऋषि आश्रम में आये. शकुन्तला दुष्यन्त की याद में इतना अधिक खोई हुई थी कि उसे दुर्वासा ऋषि के आने का पता ही नहीं चला. शकुन्तला ने उनका आदर – सत्कार नहीं किया. जिससे क्रोधित होकर दुर्वासा ऋषि ने शकुन्तला को शाप दिया कि ‘ जिसकी याद में खोये रहने के कारण तूने मेरा सम्मान नहीं किया, वह तुझको भूल जायेगा’. दुर्वासा – एक मुनि जो शंकर के अंश से उत्पन्न अनुसूया और अत्रि के पुत्र थे. ये अत्यंत क्रोधी थे. शकुन्तला की सखियों ने क्रोधित ऋषि से अनजाने में उससे हुए अपराध को क्षमा करने के लिए निवेदन किया....

राजा हरिश्चंद्र

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राजा हरिश्चंद्र की कहानी एक बार राजा हरिश्चंद्र के सपने में गेरुआ वस्त्र धारण किए हुए एक साधु आए, जिन्होंने सम्राट से उनका पूरा राज पाठ दक्षिणी में मांगा लिया। राजा इतने दयालु थे, कि वह कभी भी अपने शरण में आए हुए किसी भी साधु को खाली हाथ नहीं लौटने देते थे, इसलिए राजा हरिश्चंद्र ने अपना पूरा राज्य उन साधु के नाम कर दिया। अगले दिन जब सवेरा हुआ तो राजा के दरबार में एक साधु ने दर्शन दिया। महाराजा हरिश्चंद्र को उस साधु ने अपना सपना याद करवाया, जिसमें उन्होंने अपना सारा राजपाट साधु के नाम कर दिया था। जैसे ही हरीश चंद्र जी को अपना सपना स्मरण हुआ, तो बिना किसी देरी के उन्होंने हामी भरी और अपना विशाल राज्य उन साधु के नाम कर दिया। दरअसल साधु के वेश में वह महात्मा और कोई नहीं, बल्कि स्वयं महर्षि विश्वामित्र थे जो राजा हरिश्चंद्र की परीक्षा लेने आए थे। इसके आगे साधु ने राजा से दक्षिणा की मांग की। हरीश चंद्र जी ने अपने सिपाहियों को शाही खजाने में से भेंट लाने के लिए कहा। लेकिन साधु ने उन्हें स्मरण कराया की राजा ने तो पहले ही सब कुछ साधु के नाम कर दिया है, तो वह राजकोष में से खजाना भला उन्हें दक्षि...

चौथ माता

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चौथ माता की कहानी  सेठ-सेठानी थे। उनके एक बेटा और बहू थे। बहू सबको भोजन कराके फिर स्वयं भोजन करती। एक पड़ोसन ऐसी भी थी, जो रोज पूछती कि बहू आज क्या बनाया-खाया है? बहू कहती- ठंडो बासी। एक दिन उसके पति ने ऐेसा सुनकर विचार किया कि आज तो पकवान बनाए जाएं, फिर देखें कि मेरी पत्नी क्या कहती है? उसने तरह-तरह के पकवान बनवाए और घर के सभी लोगों ने एकसाथ बैठकर भोजन किया। आज भी पड़ोसन ने पूछा तो बहू ने कहा ठंडो बासी। सेठ के लड़के ने सोचा, हो न हो कोई बात अवश्य है जिससे कि मेरी पत्नी ऐसा कहती है। उसने पत्नी से पूछा- तुम रोज 'ठंडो बासी खाया' ऐसा क्यों कहती हो, ज‍बकि अपन सबने एकसाथ बैठकर कई तरह के पकवान खाए? उसकी पत्नी बोली- अपन जो खा रहे हैं, वह बाप-बूढ़ों की कमाई है जिस दिन आप कमाकर लाओगे, उस दिन मैं समझूंगी कि ताजा भोजन कर रहे हैं।    अब एक दिन लड़के ने मां से कहा- मैं एक बड़े शहर में कमाई करने जा रहा हूं। मां बोली- बेटा, अपने पास इतना धन है कि 'खाया नहीं खुटेगा'। मां के मना करने पर भी बेटे ने स्वयं कमाने का दृढ़ निश्चय कर लिया और जाते समय पत्नी से कहा- 'मैं जब तक कमाकर बहुत-सा ...

रावण के जन्म की कहानी

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रावण के जन्म की कहानी (Ravan ke janam ki kahani) पूर्वकाल में ब्रह्मा जी ने अनेक जल-जन्तु बनाये और उनसे समुद्र के जल की रक्षा करने के लिये कहा। तब उन जन्तुओं में से कुछ बोले कि हम इसका रक्षण (रक्षा) करेंगे और कुछ ने कहा कि हम इसका यक्षण (पूजा) करेंगे। इस पर ब्रह्माजी ने कहा कि जो रक्षण करेगा वह राक्षस कहलायेगा और जो यक्षण करेगा वह यक्ष कहलायेगा। इस प्रकार वे दो जातियों में बँट गये। पौराणिक काल में राक्षसों में हेति और प्रहेति दो भाई थे। प्रहेति तपस्या करने चला गया, परन्तु हेति ने भया से विवाह किया जिससे उसके विद्युत्केश नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। विद्युत्केश के सुकेश नामक पराक्रमी पुत्र हुआ। सुकेश के माल्यवान, सुमाली और माली नामक तीन पुत्र हुए। तीनों ने ब्रह्मा जी की तपस्या करके यह वरदान प्राप्त कर लिये कि हम लोगों का प्रेम अटूट हो और हमें कोई पराजित न कर सके। वर पाकर वे निर्भय हो गये और सुरों, असुरों को सताने लगे। उन्होंने विश्‍वकर्मा से एक अत्यन्त सुन्दर नगर बनाने के लिये कहा। इस पर विश्‍वकर्मा ने उन्हें लंका पुरी का पता बता कर भेज दिया। वहाँ वे बड़े आनन्द के साथ रहने लगे। माल्यवान के व...

अक्षय तृतीया( आखा तीज)

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इस वर्ष अक्षय तृतीया का पर्व शुक्रवार, 10 मई  को मनाया जाएगा। वैदिक पंचांग के अनुसार वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि की शुरुआत 10 मई को सुबह 4 बजकर 17 मिनट पर होगी। वहीं इस तृतीया तिथि का समापन 11 मई 2024 को सुबह 02 बजकर 50 मिनट पर होगी। उदया तिथि के आधार पर 10 मई को अक्षय तृतीया का पर्व मनाया जाएगा। अक्षय तृतीया का पर्व हर साल वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। यह व्रत गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश सहित पूरे उत्तर भारत में मनाया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में इसे आखातीज या अक्खा तीज कहते हैं। आओ जानते हैं इस संबंध में पौराणिक तथ्य।. अक्षय तृतीया को 'अखा तीज' भी कहा जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ऐसी मान्यता है कि इसी दिन भगवान परशुराम, नर-नारायण और हयग्रीव का अवतार हुआ था 1. इस दिन भगवान नर-नारायण सहित परशुराम और हयग्रीव का अवतार हुआ था।    2. इसी दिन ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का जन्म भी हुआ था। कुबेर को खजाना मिला था।   3. इसी दिन बद्रीनारायण के कपाट भी खुलते हैं। जगन्नाथ भगवान के सभी रथों को बनाना...